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Nanhe Dag, Lambi Dagar..

Kuchh Bhaav Jinhe Shabdon Ki Aawaaz Diye Bina Raha Nahi Jaata…

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Timsy Mehta ( टिम्सी मेहता )


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असली राजा-नकली राजा

Posted On: 16 Feb, 2012  
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जनरल डब्बा में

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दुनिया गोरखधंधा है…

Posted On: 8 Feb, 2012  
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जनरल डब्बा सोशल इश्यू में

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मीठे गन्ने का कड़वा रस..

Posted On: 1 Feb, 2012  
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जनरल डब्बा सोशल इश्यू में

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रस-रूप-गंध महोत्सव!

Posted On: 24 Jan, 2012  
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जनरल डब्बा में

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मेरी सीख, मेरे लिए..

Posted On: 16 Jan, 2012  
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इस गुनगुनी धूप में . . .

Posted On: 10 Jan, 2012  
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मम्मी, सोने दो न!

Posted On: 3 Jan, 2012  
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ये त्योहार जिया जाए…

Posted On: 27 Dec, 2011  
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मेरी धरती, या वो तारा…

Posted On: 21 Dec, 2011  
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पहेली ही है जीवन…

Posted On: 13 Dec, 2011  
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जनरल डब्बा में

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हर फ़िक्र को धुंए में…

Posted On: 5 Dec, 2011  
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सर्दी का रोमांच

Posted On: 30 Nov, 2011  
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जनरल डब्बा सोशल इश्यू में

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ये बार्बी-डॉल संस्कृति…

Posted On: 23 Nov, 2011  
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जनरल डब्बा में

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दुनिया के समंदर में…

Posted On: 15 Nov, 2011  
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बातों की बातें..

Posted On: 9 Nov, 2011  
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विश्वविद्यालय के गलियारे से..

Posted On: 1 Nov, 2011  
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शुभ दीपावली भारत !

Posted On: 26 Oct, 2011  
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दीपावली के स्वागत में..

Posted On: 23 Oct, 2011  
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जनरल डब्बा में

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पक्षी की संवेदना

Posted On: 21 Oct, 2011  
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जनरल डब्बा में

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

नमस्ते टिम्सी जी, आप एक नितांत ही अछूता विषय ले कर आई हैं जो सीधा सीधा संस्कृति से सम्बंधित है। यह विषय इतना व्यापक है कि इसके बारे में प्रतिक्रिया के स्थान पर एक पोस्ट की आवश्यकता पड़ेगी। फिर भी संक्षेप में यही कहूँगा कि यहाँ पर जिस परम्परा का आपने ज़िक्र किया है वो केवल इसलिए है कि सब राजपाट खत्म हो जाने के बाद भी वो अपने आप को दूसरों से अलग समझना चाहते हैं। यह उनकी सोच है कि उनके अंदर राजसी गुण अभी विद्यमान हैं। यह एक सामंतवादी सोच जैसा है। एक तरह की खानदानी सनक कि मैं विशिष्ट हूँ जो मेरे पास है वो किसी और के पास नहीं। हालांकि यहाँ बनारस में भी इसका एक उदाहरण मिलता है पर उसका आधार विशुद्ध व्यवसायिक है। यहाँ के पान बहुत मशहूर हैं और इसका व्यापार करने वाले चौरसिया बंधु पान के पत्ते के संरक्षण की प्रक्रिया जिस स्थान पर करते हैं वहाँ अपनी बेटियों को नहीं जाने देते ताकि उनके संरक्षण की कला किसी दूसरे के घर में न पहुंचे और उनके व्यवसायिक हितों पर कोई दुष्प्रभाव पहुंचे। एक अच्छी सांस्कृतिक-सामाजिक पोस्ट के लिए हार्दिक बधाई। आभार सहित,

के द्वारा: वाहिद काशीवासी

अपनी विशिष्टता बनाये रखने के लिए अगर सूर्य ने भी धरती को अपना प्रकाश देना बंद कर दिया होता, तो आज धरती पर जीवन का लवलेश भी न होता. फूलों ने अपनी विशिष्टता बनाये रखने के लिए अगर अपनी पंखुड़ियाँ न खोली होती, तो दुनिया में सुगंध का नाम भी कोई न जानता होता. कवि-गीतकार ने अगर अपनी कृतियाँ स्वयं तक ही रखी होती, क्या तब जीवन संगीतरहित होकर नीरस-उबाऊ न हो गया होता! विचारकों ने भी अगर अपने विचार खुद तक ही महफूज़ रखे होते, तो दुनिया में कभी कोई नवीन क्रान्ति न आ पाई होती. हम लोग आज तक भी शायद पैदल यात्रा कर रहे होते, आदरणीय शशि भूषण जी, सुप्रभात. अगर जे जे मंच न होता तो आपका आशीर्वाद , स्नेह भी न मिला होता.

के द्वारा: PRADEEP KUSHWAHA

मैंने आपकी इस टिप्पणी को लगभग ५-६ बार पढ़ा. और हर बार, हंसते हुए! आपके शब्दों में ही 'लाफिंग गैस' छिपी होती है. जहां तक उत्साहहीन उत्तर देने का आरोप है, तो अपनी सफाई में मुझे यही कहना है, की यह आरोप निराधार है मीलॉर्ड! सच तो यह है, की इस बार आप सब ने मुझे इतनी स्नेहसिक्त स्वीकृति दी है, जो मुझे धन्यवाद से भरे रखती है. कहने को उतने विशेष शब्द मिल ही नही पाए. और यकीन कीजिये, कांटेस्ट के लिए लिखी जरुर थी, पर अगर आप कांटेस्ट के प्रारूप को जांचेंगे, तो देखेंगे,की मैंने मानदंडों के विपरीत इसे लिखा था. तो.. परिपाटी से हटकर अपने ये विचार प्रस्तुत करना ही एकमेव लक्ष्य था. कांटेस्ट जीतने की तो स्थिति ही नहीं दीख रही थी. इसलिए, उत्साहहीन होने का प्रश्न ही नहीं उठता. और उससे भी बड़ी बात, की जो स्वीकृति अब मिली है, वह यों ही हर्षित कर रही है. फिर भी यह आरोप! नहीं-नहीं-नहीं! और चुनावी कांटेस्ट में भागीदारी, मेरे लिए तो असंभव के समान है. राजनीती नामक ऊँट की करवट की दिशा बता पाना मेरे बस की बात नाही है..! हाहा.. जो भी हो, इस बार के लाफ्टर-चेलेंज में विजेता बनकर निकलने की आपको मेरी और से ढेरों शुभकामनाएं! दल-बल के साथ जाइए, और जंग जीत आइये. अंत में, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद... सादर.
महोदय, सादर क्षमाप्रार्थी हूँ. पर यह समझ पाने में अक्षम हूँ, की आपकी यह टिप्पणी सहमती दर्शा रही है, या असहमति.. यदि आप असहमत हैं, तो मुझे स्पष्टीकरण देने का प्रयास करना ही चाहिए. मैंने पूरे आलेख में यही पक्ष रखा है, की मनुष्य 'देने' की प्रथा को बिसार ही चुका है. और इसी क्रम में, प्रेम के वास्तविक मायने कहीं खो चुके हैं. वह प्रकृति ही है, जो हमें प्रेम का वास्तविक अर्थ समझा सकती है, यदि हम समझने के इच्छुक हों तो. एक माता की तरह वह हमसे निश्छल प्रेम करती है. वह देना जानती है. अत: वह प्रेम करना जानती है. मेरा आशय था, की मनुष्य बाहरी, और आंतरिक दोनों प्रकृतियों की अनदेखी करते हुए, विकृतियों की यात्रा पर निकला हुआ है. बस, वही कहने का प्रयास किया था. यदि अब भी आपको किसी कोण से असहमति प्रतीत होती है, तो अवश्य अवगत कराएँ! सादर धन्यवादी हूँ.
आदरणीया टिम्सी जी, सादर नमस्कार,     भाषा पर आपकी मजबूत पकड़ की सराहना न करना मेरे विचार से आपकी प्रतिभा के  साथ अन्याय होगा। मैं इस अन्याय का भागीदार नहीं बनते हुये, आपकी भाषा शैली की अत्यधिक सराहना करता हूँ। शब्दों का चयन भी बेमिसाल  है।      विषय के साथ ही विश्लेषण भी उच्चस्तरीय है। सच है कि प्रेम को समय में बांधना बालहठ के अतिरिक्त कुछ नहीं है। प्रेम तो सर्वकाल एवं सर्वव्याप्त है। यदि प्रेम को ईश्वर कह दिया जाय तो शायद अतिशयोक्ति न होगी। जहाँ प्रेम है वहीं ईश्वर है तथा जहाँ ईश्वर है वहीं प्रेम है अथवा ईश्वर ही प्रेम है। यह भी निर्विवाद सत्य है कि प्रेम का विषय बहुत ही जटिल है।    हम भ्रम वश वासना को प्रेम समझ लेते हैं। प्रेम तो जीवन है, धड़कन है, इसके बिना शायद मैं तो एक पल जीवित नहीं रह सकता। प्रेम को अपनी महत्ता सिद्ध करने के लिये शायद हमारी अवश्कता नहीं है, अपितु हमें अपनी महत्ता स्थापित करने के लिये प्रेम की आवश्यकता है।    प्रेम मनुष्य का स्वाभाविक गुण है। स्वाभाविकता को दिखाने और मनाने की जरूरत क्यों पढ़ गई मेरी समझ के बाहर है।    टिम्सी जी माफ करना, शायद कुछ अधिक लिख गया, यदि कुछ अनुचित लगे तो छोटा भाई समझ कर माफ कर देना।

के द्वारा: dineshaastik

बहुत दिनों के बाद आज सफलता मिल पाई कमेन्ट पोस्ट हो गया पार्टी ड्यू हो गई -  हा हा हा हा हा हा मैंने पहले ही कहा था की जो हो रहा है होने दो लेकिन फिर भी आपने पंगा ले ही लिया अपनी बात खुद ही काटनी पड़ गई - और उसका आपको पता भी नहीं चला - इसको कहते है समय का फेर - इस लेख को कांटेस्ट के लिए जितने समर्पण + मेहनत और उत्साह से आपने लिखा था लेकिन जब यह पता चला की इस तरह का कोई कांटेस्ट ही नहीं है तो आपकी सक्षम और जादुई लेखनी से प्रभावित होकर जिन्होंने भी आपको अपने कमेन्ट से नवाजा उनको आपने उत्साहहीन उत्तर दिए ..... भला इसमें किसी का क्या कसूर है भला ..... किसी भी इनाम से बढ़कर ब्लागरो का प्यार और स्नेह है .... फिर भी चुनाव कांटेस्ट तो चल ही रहा है उसके लिए मेरी शुभकामनाये अग्रिम रूप से ..... मैं जिसको शुभकामनाये देता हूँ वोह जीतता ही है (इतिहास गवाह है )

के द्वारा: Rajkamal Sharma

के द्वारा: Rajkamal Sharma

आदरणीया महोदया जी, अभिवादन. इस लेख को मैं कई कई बार पढ़ रहा हूँ. चिडिया और प्रेम कुछ कुछ समझ आ रहा था . प्रेम की अभिव्यक्ति के लिए दिन, महिना, तारीख हो, होली दीवाली के लिए वार्षिक हो, भ्रमित कर रहा था. पर आपने मिन्टोस की गोली दी दिमाग ऑन हो गया. एक भयातुर पक्षी भी जब हमारे आगे समर्पण कर दे, तो जान लेना चाहिए, कि प्रेम-भाव सिद्ध हो गया है. विकृतियों का आवरण हटकर संस्कृति का उद्भव स्वयं हो जायेगा. फिर किसी ‘वेलेंटाइन-डे’ पर अपने अस्तित्व की भिक्षा मांगता प्रतीत नहीं होगा प्रेम! ‘प्रेम’ मेरी समझ में भावनाओं का वह विशुद्धतम स्वरूप है, जो केवल मन से ही एक अदृश्य रस के रूप में प्रवाहित होता है, और सिर्फ मन ही उसे ग्रहण कर सकता है. यहाँ उद्देश्य कुछ पाना तो होता ही नहीं है, बस.. देना, बाँटना, फैलाना! अपनी शुभकामनाओं को, शुभ-भावों को शब्दों की आकृति में सीमित किये बिना, और किसी प्रत्युत्तर की आशा से रहित होकर अर्पण करते रहना ही तो प्रेम है!

के द्वारा: PRADEEP KUSHWAHA

महोदय, आपके शब्द बहुत अच्छे लगे. निजी मत दूं, तो वेलेंटाइन डे मनाने में आपत्ति होनी चाहिए, अथवा नहीं, यह बहस का विषय है. पर उसे प्रेम का नाम देना अटपटा लगता है. इस आलेख में, मैंने ऐसा कहने का प्रयास किया है, की जिसे यहाँ प्रेम का नाम दिया जा रहा है, वह एक बहुत ही सतही भाव-वृत्ति है. और प्रेम का अपमान भासता है इसमें. लेकिन जहां समर्पण है, विश्वास है, मूल्यों का निर्वाह है, वहां कोई प्रश्न नहीं उठना चाहिए. यदि आप इस अवसर पर नैष्ठिक होकर किसी को उपहार देते हैं, तो ठीक है. पर प्रश्न तो निष्ठा का ही है न! वह हो तो...! और यदि निष्ठा है, तो दिन कोई भी हो, उत्सव स्वयम हो ही जाएगा.. पुन:, मैंने जिन बिन्दुओं पर आलेख में विचार दिए हैं, वे उपस्थित हैं.. १. वेलेंटाइन डे जैसे अवसरों पर जो प्रदर्शन होता है, उसमे भावों की गहराई का भला क्या स्थान है! सतही, दिखावटी, नकली, दिन-दिन में बदल जाने वाले भाव को प्रेम कहने की परंपरा ही कहाँ से शुरू हो गयी होगी! २. वेलेंटाइन डे जैसे भ्रामक शब्द उन भावों का चुपके-ही दोहन करने लगते हैं, जिन्हें सूक्ष्मता में मग्न होना भा रहा होता है. ३. मन दोबारा चल निकलता है किसी नए जलाशय की खोज में. ऐसी खोज किसी वेलेंटाइन डे-सदृश नाम से कभी उत्तरित नहीं हो सकती. प्रेम, अथवा पूर्णता ‘देने’ पर ही घटित होता है. ४. एक भयातुर पक्षी भी जब हमारे आगे समर्पण कर दे, तो जान लेना चाहिए, कि प्रेम-भाव सिद्ध हो गया है. विकृतियों का आवरण हटकर संस्कृति का उद्भव स्वयं हो जायेगा. फिर किसी ‘वेलेंटाइन-डे’ पर अपने अस्तित्व की भिक्षा मांगता प्रतीत नहीं होगा प्रेम! ५. ‘प्रेम’ मेरी समझ में भावनाओं का वह विशुद्धतम स्वरूप है, जो केवल मन से ही एक अदृश्य रस के रूप में प्रवाहित होता है, और सिर्फ मन ही उसे ग्रहण कर सकता है. यहाँ उद्देश्य कुछ पाना तो होता ही नहीं है, बस.. देना, बाँटना, फैलाना! अपनी शुभकामनाओं को, शुभ-भावों को शब्दों की आकृति में सीमित किये बिना, और किसी प्रत्युत्तर की आशा से रहित होकर अर्पण करते रहना ही तो प्रेम है! ..... इसे पढकर आप शायद मानेंगे, की मेरी आपत्ति विशेष रूप से दिवस-विशेष पर न होकर प्रेम के नाम पर उपजती विकृत्तियों हेतु है. आशा है, आप इसपर दृष्टिपात करेंगे, एवं कोई भूल हो, तो क्षमा करेंगे. सादर धन्यवाद.
टिम्सी जी नमस्कार, बहुत सुन्दर आलेख. सत्य है प्रेम तो स्वतः उपजने वाली चीज है कोई दिखावे की वस्तु नहीं.किन्तु वेलेंटाइन डे यदि मनाया जाता है तो आपत्ति क्या है? क्या भारतीय इस बात से घबराहट में हैं की यह विदेशी त्यौहार है और हमारी संस्कृति पर आक्रमण है? हमारे देश के कोई बाबाजी के मन की उपज होती तो यह बहुत अच्छा त्यौहार होता? मैंने कहीं पढ़ा था की आप अपने परिवार में पत्नी बच्चों से प्यार करते हैं तो उन पर प्रदर्शित भी करें ताकि वे अधिक अच्छा महसूस करें और वेलेंटाइन डे भी मुझे उसके लिए एक अवसर के सामान दिखता है. यूँ तो हम कई बार परिवार के साथ होटल में खाना खाने जाते हैं, अब यदि मै अपनी पत्नी को वेलेंटाइन डे पर होटल में ले जाऊं तो मुझे नहीं लगता की उसे बुरा लगेगा और यूँ तो कम ही मौके आते हैं जब में पत्नी को पुष्प गुच्छ भेंट करूँ यदि मै वेलेंटाइन डे पर उसे पुष्प दूँ तो क्या उसे बुरा लगेगा? हाँ यदि कोई सड़क पर प्रेम का इश्तहार लेकर घूमता है तो यक़ीनन वह हमारी संस्कृति नहीं है. किन्तु प्रेम किया है तो उसे किसी ख़ास दिन व्यक्त करने में संकोच भी नहीं है.

के द्वारा: akraktale

हम हर दिन उल्लास में जियें. प्रकृति प्रदत्त आशीष को समझें. मन में व्यर्थ वैर-विरोधाभास को स्थान न दें! अकारण ही शुभत्व का विस्तार करते रहें. उसके बाद किसी से प्रेम की परिभाषा पूछने की आवश्यकता नहीं रह जाएगी! प्रेम हमारा स्वभाव हो जायेगा. एक भयातुर पक्षी भी जब हमारे आगे समर्पण कर दे, तो जान लेना चाहिए, कि प्रेम-भाव सिद्ध हो गया है. विकृतियों का आवरण हटकर संस्कृति का उद्भव स्वयं हो जायेगा. फिर किसी ‘वेलेंटाइन-डे’ पर अपने अस्तित्व की भिक्षा मांगता प्रतीत नहीं होगा प्रेम! आदरणीया मेहता जी , सादर अभिवादन. मेरा भी मन करता है. बगिया में चिड़ियों के साथ खेलने का, ऐसा नहीं हो सका है. लेख आपका ऐसा है जैसे पेपर सोल्व कर रहें हो. सुन्दर badhai.

के द्वारा: PRADEEP KUSHWAHA

टिम्सी जी नमस्कार, सबसे पहले आपकी भाषा शैली और उस पर आपकी मज़बूत पकड़ की दाद देना चाहूँगा। आपके लेख में व्यक्त विचारों से पूरी सहमति रखता हूँ मैं। निस्वार्थ, निष्कलंक, निश्छल होता है प्यार| और जिसे हो जाता है वो भी ऐसा ही हो जाता है। प्रेम एक उदात्त भावना है जिसका काम सिर्फ़ और सिर्फ़ देना है पाने की कोई आकांक्षा नहीं होती। चाहे धरती हो या आसमान, नदी हो या झरने,पेड़-पौधे, यहाँ तक की ख़ुद अपने अंदर झाँकने पर भी प्यार ही नज़र आएगा पर शर्त यही है कि हमें स्वयं से और औरों से प्यार करना आना चाहिए।वैलेंटाइन डे को आज भले ही प्रेम-दिवस का दर्ज़ा दे दिया गया है मगर हम सबको पता है कि वो तो हमेशा से और हर जगह व्याप्त है, ज़रूरत है उसे पहचानने की अपने अंदर के प्यार को जगाने की। साभार,

के द्वारा: वाहिद काशीवासी

दूसरी ओर, वेलेंटाइन डे जैसे अवसरों पर जो प्रदर्शन होता है, उसमे भावों की गहराई का भला क्या स्थान है! सतही, दिखावटी, नकली, दिन-दिन में बदल जाने वाले भाव को प्रेम कहने की परंपरा ही कहाँ से शुरू हो गयी होगी.. प्रेम मनुष्य का स्वभाव है. और स्वभाव में जीना ही प्रसन्नता का कारक होता है. पर विपरीत दिशा में चलते हुए स्वाभाविक जीवन सम्भव नहीं है... टिम्सी जी सुन्दर सम सामयिक लेख ..सुन्दर विचार हैं आप के आइये प्रेम के अनेक छिछोरे रूपों में न जा के प्रेमी दिवस के रूप में अपने नैसर्गिक वास्तविक प्राकृतिक रूप में प्यार से दिल से इसे मनाएं .. ये रोज वाला ही प्रेम हो रोज हो तो आनद और आये .. जय श्री राधे भ्रमर ५

के द्वारा: surendra shukla bhramar5

timsy जी बहुत ही सुन्दरता पूर्वक प्रेम की व्याख्या की है आपने. बहुत ही सुन्दर. मैं भी इस विषय में बस इतना कहना चाहूँगा. क्या होता है valentine day ? क्या प्रेम करने के लिए किसी ख़ास अवसर या दिन की आवशयकता है. हम उस देश के वासी है जहां पूर्ण वर्ष प्रेम के गीत गाये जाते रहे है. गोपिय १२ माह कृष्ण से प्रेम में डूबी रहती थी, मीरा नाचती थी नित्य हर शन्न भूलकर, बुल्लेशाह के प्रेम का क्या कहना. माँ का संतान से प्रेम किसी निश्चित दिन का मोहताज नहीं फिर क्यों पड़ी हमें आवशयक औरो के बनाए दिन मनाने की. क्या हम सभी दिन प्रेम करना भूल तो नहीं गए? मदर डे, फादर डे की क्या है आवशकता. उन्हें एक फूल देकर जो उनका न किया मान न रखा सम्मान तो उसका क्या फायदा. मात पिता तो हर दिन है पूज्य. यदि एक बार भी प्रेम को हम जान पाते तब हम यह प्रशन अवश्य उठाते, क्या होता है valentine day ?

के द्वारा: Amar Singh

टिम्सी जी, नमस्कार प्रेम क्या है, हम तो अभी तक नहीं समझ सके और इच्छा भी नहीं है समझने की क्यूंकि इसकी कोई परिभाषा नहीं बनाई गयी है मूलतः ये हमारे अन्दर की आवाज़ है जो हमें बतलाती है की कोई जिसके बारे में हम अच्छा सोचते है या जो हमारे बारे में अच्छा सोचता है वे एक दुसरे के प्रेमी है, फिर चाहे वो कोई भी हो आदमी, जानवर या कोई निर्जीव वस्तु भी पर आज प्रेम का प्रमाण पत्र के रूप में इस "‘वेलेंटाइन-डे’ को इतना उठा दिया गया है की हंसी आती है ऐसे बांतो पर अभी कुछ दिनों पहले मैंने न्यूज़ में पढ़ा था की अमेरिका में लोग पतलून दिवस मना रहें थे जिसमें वहाँ के लोग एक दिन बिना पैंट के ही बाहर निकल काम पे जा रहें थे, बस इसी तरह ही कुछ ‘वेलेंटाइन-डे’ के साथ भी हुआ होगा और हो सकता है की भविष्य में हम भी पतलून दिवस मनाये हमारी समस्या ही यही है हम कोम्पितिसन में लगे हुए है बुरी बात नहीं है पर समस्या यह है की आज की नयी पीढ़ी को भुत सवार हो गया है उनकी नक़ल करने का, और इसका परिणाम ये हो रहा है की घर के लोग भी उन्हें आजादी दिए हुए है जिसका बेमतलब फायदा उठाया जा रहा है खैर आच्छी लेख पर आपको बधाई, और सुभकामनाए की आपके किसी परिचित को ये रोग ना लगे..........हा हा हा

के द्वारा: ANAND PRAVIN

वी.आई.पी के लिए भी 'चलता' है.. आम आदमी के लिए भी 'चलता' है.. पर जिनके पेट-पीठ एक हो चुके हैं... उनके लिए नहीं 'चलता'. उनका स्वप्न हमारी तरह 'वी.आई.पी' होना न होकर...घर में आटे का कनस्तर भरा देखना होता है. पर हमारी सपनों से भरी आँखें उनकी आँखों के दर्द कभी पढ़ नहीं पाती. हम को तो बस अपने प्रिय अभिनेता, और खिलाडियों के सलामती की दुआ करना अच्छा लगता है, क्योंकि वो महँगी घड़ियों की एड करते हैं. महंगे चश्मे-जूतों का प्रदर्शन करते हैं. अक्सर विदेश जाया करते हैं. और महँगी शराब पीते हैं. 'कभी-कभी' कोई गैर-कानूनी काम भी कर लेते हैं.....या शायद पकड़े 'कभी-कभी' जाते हैं. खैर, जो भी हो, आदर्श चुनने के मामले में हमारा कोई मुकाबला नहीं है. जय भारतवासी. अन्यथा न लें, मन का रोष निकल जाता है कभी-कभी.. सादर धन्यवाद.
अच्छे बच्चे ज्यादा चाकलेट नहीं खाया करते और अगर खा भी लिया है तो एक बार उठने से पहले और दूसरी बार सोने के बाद ब्रुश जरूर करते है ..... क्यों ना लगे हाथ एक लेख नकली (क्रर्तिम ) चाकलेट बनाम(प्राक्रतिक ) असली गन्ना हो जाए ...... वैसे डाबर का मिस्वाक + डाबर लाल दंत मंजन और काला नमक तथा सरसों का तेल(दो चम्मच तेल में चुटकी भर नमक मिला कर मुंह में हिलाते हुए थोड़ा -२ मिश्रण बाहर गिराते हुए ज्यादा से ज्यादा देर तक करने पर गन्ना चूस सकते है ) हा हा हा हा हा हा हा हा हा :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| का इस्तेमाल गन्ने को खाना सहज बनाता है

के द्वारा: Rajkamal Sharma

'हे राम'...!!! आपकी अद्भुत टिप्पणी पढ़कर सीधे यही निकला मेरे मन से! हाहा.. बिलकुल ठीक पहचाना आपना, 'wisdom tooth' ही निकल रहा है..! देखते हैं, wisdom में कुछ इजाफा हो पाता है या नहीं इसके बाद..! दर्द में भी हँसा दिया आपने! किस मुँह से धन्यवाद दूं! :) अब तारीफ की बारी आपकी आती है. १) आप किसी को दर्द में भी हँसा सकती हैं. साधुवाद. २) आपकी नज़र बहुत पैनी है. राष्ट्र्धन बन सकती है ये!(आपकी लेखनी के माध्यम से).. ३) आपके विचारों में ईमानदार प्रस्तुती झलकती है. ४) आपके विचारों एवं प्रस्तुती में स्पष्टता बहुत नज़र आ रही है. एक कुशल अधिवक्ता के गुण होते हैं ये. ... और भी बहुत सारी तारीफ हो सकती है. पर अगली वार्ता के लिए भी तो कुछ बचाकर रखना ही चाहिए..और ये केवल एक प्रत्युत्तर नहीं, अपितु स्वत: उत्पन्न प्रतिक्रिया है.! :) स्वागतम, एवं धन्यवादम!
कमाल की रचना, हमारे हाथों की तरह एक एक शब्द एक दूसरे से जुड़े हुये प्रतीत होते हैं। सॉरी, प्रतीत नहीं होते बल्कि सचमुच जुड़े हुये हैं। बहुत ही उच्च श्रेणी की रचना। बूँद को सागर बनाने वाली रचना। लय, गति, तारतम्य तीनों में अद्भुत सामन्जस्य। सुन्दर शब्द चित्र अंकित किये हैं आपने। छोटी सी रचना किन्तु संदेश इतना बड़ा कि शब्दों में न समा सके। बिहारी के दोहों की तरह। यह अतिशयोक्ति पूर्ण प्रसंशा नहीं है। अपितु  इसकी हकदार है। प्रत्येक व्यक्ति से जुड़ी है यह रचना। रचना की  महानता इसी से स्थापित होती है कि इसके पहले शब्द से लेकर आखरी शब्द तक मैं जुड़ा रहा। यह रचना इससे भी  अधिक सराहना की अधिकारी है, इसलिये क्षमा चाहता हूँ, क्योंकि सही शब्दों का चयन नहीं कर पा रहा हूँ। बस अंत में अनगिनत आभार....... कृपया इसे भी पढ़े- आयुर्वेदिक दिनेश के दोहे भाग-2 http://dineshaastik.jagranjunction.com/

के द्वारा: dineshaastik

आदरणीय भ्राता जी..! पुन: स्वागत है मंच पर आपका..! शायद ही कोई नित्य लेखक-पाठक हो, जिसे आपकी अनुपस्थिति खली न हो इस बीच..! फिर भी, सबका जीवन है, व्यस्तताएं हैं..! समझ में आता है. :) आपकी इस उदार टिप्पणी का प्रत्युत्तर देने के लिए बहुत प्रयास किये. पर शब्द कम ही रहेंगे..! इसलिए.. केवल 'धन्यवाद'..! और रचना समंदर जी का आपने नाम लिया. आपको आश्चर्य होगा, पर केवल दस दिन पहले ही उनके बारे में मुझे पहली बार पता चला. उनके लेख खोजने की कोशिश भी की, पर मिल नहीं पाए. खैर, दिग्गजों के साथ मेरा मिलान, बस आप लोगों का बड़प्पन है..! पुन:-पुन: आभार..! पुन: नव-संवत्सर, एवं उससे पहले के सभी त्योहारों के लिए बहुत-बहुत बधाई स्वीकारें..! सादर..!

के द्वारा: RaJ

के द्वारा: mparveen

सादर धन्यवाद आपका. मेरा लक्ष्य तो केवल निर्धन-नारायण के हित में लिखना ही था. अब जैसे की एक काले रंग का चित्र बनाते हुए उसके इर्द-गिर्द श्वेत बोर्डर बनाया जाता है, तो वो सफ़ेद रंग का सौन्दर्य दिखाने के लिए नहीं होता, या फिर काले और सफ़ेद का भेद बताने के लिए नहीं होता. वो तो कालिमा को और प्रगाढ़ करने के लिए होता है. इसी दृष्टि से, मैंने पहले सर्दी का सौन्दर्य महिमा-मंडित किया था. जिससे निर्धन समाज की पीड़ा का प्रभाव सब को छू सके.. निश्चय ही, आप सब लोग इस सन्देश को समझ पाए, और उस पर आप सब की मर्मस्पर्शी टिप्पणियाँ ऐसा इंगित कर रही हैं, की इस बार वो दर्दनाक दृश्य फिर नहीं दिखेंगे.. एक आशा के साथ, पुन: धन्यवाद.
मुझे एक बात तो अच्छी तरह समझ में आ गयी. कि सदियों के मौसम में एक गरीब आदमी, जो कल तक जीवित था, रातोंरात अखबार की एक खबर में क्यों सिमट जाता है. तिम्सी जी, आपकी करुणा से परिपूर्ण एक ह्रदय विदारक दृश्य दो दिन पहले मुझे देखने को मिल गया. मैं गया था बाजार, सब्जी लेने. पुलिस की गाड़ी और लोगों की भीड़ देखकर ऐसा लगा - अतिक्रमण हटाओ अभियान चल रहा है, प्रेस के कैमरे फोटो ले रहे थे.... थोड़ी देर पता चला कि का रात एक गरीब आदमी अपनी शरीर को गरम करने के दरम्यान आधा जलकर अकड़ गया था उसे ही उठाने पुलिस वाले आये थे.... दुसरे दिन के अखबार में काफी ढूढ़ने के बाद कही कोने में छिपा हुआ मिला-'एक विक्षिप्त व्यक्ति आग से जल मड़ा.

के द्वारा: jlsingh

अरे टिम्सी जी यहाँ तो ठण्ड से हड्डी लग रही है पाँव बर्फ जैसे कोई लोहा ठंडा हो गया और आप को सर्दी का रोमांच .कितने कपडे लादे घूमो .....अब अगर बिजली गुल तो समझो हाल ख़राब न नहाना न धोना ..वर्तन तो छू नहीं सकते कौन मांजता धोता है ..कब तक रजाई में छिपना केवल रात ही न ? पढने लिखने के लिए हाथ बाहर निकालना ....आज तो बरफ भी यहाँ मनाली में ...... सुन्दर लेख आप का... खाने पीने का मजा... जैसा आप ने लिखा ..सच सर्दी का अपना कुछ और ही आनंद है ...सार्थक और बहुत कुछ बीते दिन याद कराता आप का लेख ... भ्रमर ५ पहाड़ी इलाकों पर, जहाँ हिमपात होता है, इस मौसम में जाना मनपसंद शगल होता है ऐसे लोगों के लिए. एक बात और भी है. कहते हैं, कि जितनी कड़ाके की ठण्ड पड़ेगी, उतना ही खेतों में सोना बरसेगा. यानी कि, ठण्ड जितनी ज्यादा होगी, गेहूँ का सिट्टा उतना ही सुन्दर पकेगा.

के द्वारा: surendra shukla bhramar5

के द्वारा: tejwanig

रहिमन वे नर मर चुके जो कहूँ मांगन जाएँ, उन ते पहले वे मुए जिन मुख निकसत नाय... टिम्सी जी, निश्चित ही माँगना गलत बात है पर जो व्यक्ति मांग रहा है हम उसको कुछ देना तो इसलिए नहीं चाह रहे की देना गलत है परन्तु क्या वास्तव में ऐसे लोगों के करने के लिए कुछ हमारे मन में है...... वास्तव में नहीं ....... यदि है तो हम भी अपने आप को मजबूर पाते हैं की हम उसके लिए वो सब नहीं कर सकते जो करना कम से कम मनुष्यता के नाते बनता है........... इसी वजह से वो बच्ची आप की (या किसी की भी ) ओर अगले दिन नहीं देखती क्योंकि उसे सिर्फ खोखले आदर्श दिखाई देते हैं...... उम्मीद नहीं........ एक अच्छी पोस्ट http://munish.jagranjunction.com/2011/11/25/%e0%a4%a5%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%aa%e0%a5%9c-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%97%e0%a5%82%e0%a4%81%e0%a4%9c/

के द्वारा: munish

सबसे पहले तो सुन्दर प्रतिक्रिया के लिए कोटिश: धन्यवाद..! :) जहां तक मेरे विषय में सवाल है, तो दो दृष्टि से उत्तर दिया जा सकता है. पहला: बचपन में मेरे पास बहुत सी गुडिया होती थी. गोल-मटोल भी, और बार्बी भी. बार्बी के लिए मुझे सदा ही बड़ों से आलोचना सुनने को मिल्लती थी. पर बच्चे.. उनको तो वो ही चाहिए, जो उनके दोस्तों के पास है. दूसरा: आज मुझे बार्बी संस्कृति से कोई लगाव नहीं है. मेरी दृष्टि में, ये सब छलावा है, जो उपभोक्तावाद की संस्कृति की और घसीटता है. दीखता बहुत चमकीला और लुभावना है, पर है खोखला. चरमराहट से भरा हुआ जीवन.. मुझे निजी तौर पर आहार-नियंत्रण जैसी बातें अच्छी नहीं लगती. अच्छा, स्वादिष्ट शाकाहारी भोजन मुझे बहुत पसंद है. जिम-इत्यादि का आश्रय आज तक कभी नहीं लिया, और भविष्य में भी कोई इरादा नहीं है. पुन: आभार...! :)
हाहा.. हमेशा की तरह एक चुटीली प्रतिक्रिया..! आपके विचारों का हार्दिक स्वागत है. जिमखानो को लेकर मेरे विचार अप्रासंगिक मत समझिये. बहुत से लोगों के लिए ये जानना ज़रूरी है, की जिम में किये जाने वाले व्यायाम हर एक के लिए ठीक नहीं होते. हमारी हृदय-गति के अनुरूप, और शारीरिक क्षमताओं के हिसाब से ही व्यायाम के प्रकार का चयन किया जाना ज़रूरी होता है. लेकिन जहां दस मशीनें ला कर रख दी, और भारी-भरकम फीस जमा करवा ली, वहाँ हमारी रुचि स्वयं ही हो जाती है. इसलिए, इस पर ध्यान देने की आवश्यकता है, अन्यथा, घर बैठना ज्यादा उचित होगा. उसके बाद, "जो प्राकृतिक रूप से हृष्ट-पुष्ट हैं. लेकिन समाज उन्हें ‘मोटा’ कहकर पुकारता है." कहते हुए, मैंने 'अतिरिक्त मोटापे' पर विचार नहीं दिए. पर हृष्ट-पुष्ट काया के विषय में कहा. आज तो ६० किलो भी मोटापा कहलाता है. आप भी इस बात को तो मानेंगे ही..! बाकी रही मोटी लड़कियों की शादी की समस्या... हाहा.. उसका तो केवल, और केवल एक ही इलाज हो सकता है, की समाज उन्हें स्वीकार करे. किसी एक की समस्या नहीं है, घर-घर की समस्या है ये आज. एक बेहतर वैचारिक-प्रणाली ही समाधान है. और इसे प्रबलतम वेग से फैलाए जाने की आवश्यकता है. बहुत-बहुत आभार आपका..!
आप मेरी प्रतिक्रिया के भाव को नहीं समझ पायी हैं...... मैं केवल ये कहना चाहता हूँ की कई बार हम लोग भीख देने से बचने के लिए कई उपाय करने लगते हैं....... आपके लेख मे कहीं ऐसा कुछ नहीं था पर आपके लेख को पढ़ कर मुझे अपने ही एक लेख की याद आ गई ........ जिसमे खुद मैंने ये लिखा था की बच्चों की भीख देने के स्थान पर हमें उनके हित के लिए कुछ अन्य कार्य करने चाहिए ...... पर मैं जानता हूँ की तब से अब तक मैंने उनके लिए क्या क्या किया है...... कुछ भी नहीं ...... हम केवल कहते हैं..... की पैसा देने से तो इनकी शिक्षा का प्रबंध किया जाना चाहिए..... या इनके लिए भोजन का प्रबंध किया जाना चाहिए..... पर हम केवल कहते ही है..... आपके ब्लॉग को पढ़ते समय अचानक याद सा आया की मैं पूर्व मे इस विषय पर काफी लिख चुका हूँ... पर मैंने किया क्या ?? कुछ भी नहीं....... क्योंकि मैं पात्र और अपात्र के भ्रम मे ही फंसा रहा...... तब अचानक ये विचार आया की जब हम भगवान से कुछ मांगते है और वो नहीं देता है तो हमारा रोष उसके प्रति होता है ...... जबकि वो सब कुछ जानता है की हम आगे क्या करेंगे...... फिर भी..... कई बार वो कई लोगों को छप्पर फाड़ कर देता है ..... उनमें से कई उसका सदुपयोग करते है और कई दुरुपयोग ...... नीचे दिये लिंक पर दिये लेख को पढ़ें तो शायद मेरा भाव स्पष्ट हो........ वास्तव मे इस प्रतिक्रिया मे मैं अपने उन विचारों पर ही रोष व्यक्त कर रहा था...... जो मैंने अपने लेख मे दिये थे... http://piyushpantg.jagranjunction.com/2011/02/18/%E0%A4%AD%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%80-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%A4%E0%A4%A8-%E0%A4%AD%E0%A5%80-%E0%A4%94%E0%A4%B0-%E0%A4%AE%E0%A5%9B%E0%A4%AC%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A5%80-%E0%A4%B8/

के द्वारा: Piyush Kumar Pant

आदरणीय बन्धु! विवेकपूर्ण टिप्पणी के लिए धन्यवादी हूँ. मुझे एक छोटी-सी आपत्ति है. पहले तो ये, कि अगर भगवान् ही छप्पर फाड़ कर देते, तो ६ बरस के बच्चे को हाथ फ़ैलाने की आवश्यकता ही क्या थी! निजी तौर पर मुझसे भी ये बिलकुल सहन नहीं हो पाता, कि छोटे-२ बच्चे वंचित हो कर जी रहे हैं. जहां मैंने खुद के चोकलेट का मन होने की बात कही, तो मन के इसी दर्द को शब्दित करने का ही प्रयास किया था, कि जहां एक और किसी एक के पास वैभव की कुछ भी कमी नहीं है, और दूसरी और किसी को बुनियादी आवश्यकताओं के लिए भी मोहताज होना पड़ रहा है. ईश्वरीय सृष्टि की कुछ असमानताएं ही तो हैं, जो हम जैसों को भी 'खुदा' बना देती हैं.. फिर, क्षमा करें, पर सचमुच अतिरिक्त सावधानी की ज़रूरत होती है, बाल-भिक्षा के सन्दर्भ में. कहीं हम अपनी आस्था के चलते किसी के नन्हे कदमों को गलत डगर की ओर न बढ़ा बैठें..!
timsy ऐसे मौके हमेशा आते है जब लगता है कि यदि पैसों से मदद कि तो और ज्यादा बच्चे इसी रह चल पड़ेंगे हो सकता मान बाप ही उनसे भिक्षा मंगवाने लगें औरयह कुछ हद तक सही भी इसलिए कुछ संस्थागत स्वरुप में मदद कि आवश्यकता है जरुरी यह है कि सामाजिक रूप से ऐसे विद्यालय खोले जाएँ जहाँ गरीब बच्चे खाना कपडा शिक्षा एक साथ पायें किसी भी मंदिर चढ़ाव चढाने कि वजाय बालश्रम इत्यादि में पोष्टिक खाना पहुंचा देना अत्यधिक पुण्य का काम है समय जरुर निकलना न होता है पर ऐसी संस्थाएं आस पास मिल जाती जहाँ पर पहुंचाई वस्तुएं गरीब बच्चों के काम अति हैं और बच्चों को शिक्षा देने में कई संथएं अच्छा और जज्बा हो तो खुद भी इन्हें खड़ा किया जा सकता है बधाई दिल के इतना करीब लिख पाने के लिए http://jrajeev.jagranjunction.com

के द्वारा: RaJ

बहुत-बहुत धन्यवाद महोदय..! समस्या वहाँ उठती है, जब अंतरात्मा की आवाज़, और सामाजिक-कुरीतियों का टकराव होने लगता है. छोटे बच्चे की एक मुस्कान के लिए कोई क्या नहीं करना चाहेगा ! लेकिन जब ऐसी आशंका होने लगे, कि उसके कदम नशे की और बढ़ सकते हैं, तो कोई भी ऐसी अंतरात्मा की आवाज़ को दबाना ही पसंद करेगा. हमारा समाज आज इस समस्या से जूझ रहा है. बड़े स्तर पर गरीब बच्चों को नशे की और धकेलने वाले गिरोह सक्रिय हैं. इसलिए, ये भ्रम-भय उपज ही जाते हैं. और क्रान्ति-विषयक आपका मार्ग-दर्शन बहुत ही नुकीला एवं सटीक है. मेरी दृष्टि में, अगर कहीं से क्रांतिकारी उपज हो सकती है, तो वो है सक्रिय, सकारात्मक मीडिया. इसलिए, हम सब को ही तैयार रहना चाहिए विचार के हथगोलों के साथ..! पुन:, विचार-बल प्रदान करने के लिए बहुत-बहुत आभार..!

के द्वारा: Timsy Mehta

टिम्सी जी .....नमस्कार ! नमस्कार ! शुक्रिया ! स्वागत ! आदर ! अभिनन्दन ! और आभार ! आपका प्रयास सराहनीय है .....भाव अच्छे है तो इसी कारण रचना भी बेहतरीन बन पड़ी है ..... (आगे से कभी भी अपने नाम को विदेशी मत कहियेगा –तारों की टिमटिमाती हुई सी लों सिर्फ हिन्दुस्तानी शब्द ही है ) पहले किये गए वायदे के मुताबिक कालेज का अनुभव :- कालेज के पहले साल में हम बास्केटबाल पर उलटे सीधे हाथ –पाँव चला रहे थे हम पर एम.काम के छात्रों ने कुछ फब्तियां कसी-जोकि हम सभी को नहुत ही नागवार +नाकाबिलेबर्दाशत गुजरी ..... बस हमने अपने पिरिअड छोड़ कर पूरी लगन से उस खेल की बारिकिया सीखनी शुरू कर दी –दूर के फिजिकल एजुकेशन के मैदान में छुप करके .... हाजिरी हमारी पर्ची दे देने से लग जाती थी .... दो महीने बाद हमने उनकी चुनोती को कबूल करते हुए मुकाबले की बात कही .... दो मुकाबले हमारे बीच में हुए –एक में वोह जीते तो दूसरे में हम ----- हमको सिलेबस कवर करने के लिए पूरा पसीना बहाना पड़ता था .... और यूनिवर्सिटी से रोल नम्बर आने पर प्रोफैसर साहिब कहने लगे की तुम लोगों की पर्चियो ने हाजरिया पूरी करवा कर तुमको रोल नम्बर दिलवाया है ....) मुबारकबाद और मंगलकामनाये न्ये साल तक आने वाले सभी त्योहारों की बधाई :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| http://rajkamal.jagranjunction.com/2011/11/11/राजकमल-इन-पञ्चकोटि-महामण/

के द्वारा: Rajkamal Sharma

मुझे खेद है, कि सब लोगों को अलग-अलग से धन्यवाद नहीं दिया मैंने, पर हर एक बार र्मैने सब को सामूहिक रूप से आभार व्यक्त किया है. कुछ तो समय-देवता भी मुझसे थोड़े रुष्ट हैं, और उसके बाद, यहाँ, हर एक प्रतिक्रिया के बाद जो जांच की प्रक्रिया होती है, जिसमे आपको दो दीखते हुए शब्दों को टाइप करके एंटी-स्पाम का पता देना होता है, न केवल उबाऊ है, बल्कि खीज से भर देती है मुझे. इसलिए, मजबूरीवश ही समझ लें, कि प्रतिक्रिया देना कठिन हो रहा है.. और हाँ, आपके द्वारा अमिताभ बच्चन के विषय में कहे गए शब्दों पर भी मैंने कुछ दिन पूर्व धन्यवाद ज्ञापित किया था, शायद आप की दृष्टि गयी नहीं वहाँ. फिर भी, क्षमाप्रार्थी हूँ. और अंत में, एक बार फिर, बहुत-बहुत आभार, इस प्रशंसा के लिए. अगर मेरे लिए कठिन है, तो आपके लिए भी होगा. फिर भी, आप प्रोत्साहित करने का अवसर नहीं छोड़ते, तो निश्चय ही, मेरे 'धन्यवाद' एक छोटा शब्द है. :)

के द्वारा: Timsy Mehta

टिम्सी जी ....नमस्कार ! बी.काम दूसरे साल में मैं लाइब्रेरी में बैठा हुआ था तो लाइब्रेरियन ने कहा की कालेज में नए आये हो क्या ? आज से पहले तुमको कभी नहीं देखा ! फिर उसी साल सलाना उत्सव में मैंने फेयरवेल पार्टी में अपनी कविता “जिस तरफ भी देखता हूँ नजर आती है रंग बिरंगी तितलिया ही तितलिया” सिर्फ इस बात को साबित करने के लिए की मैं भी कुछ हूँ और इसी कालेज में पढ़ता हूँ .... आज आपका यह लेख पढ़ कर मुझको भी पुराने दिन याद आ गए .... (अभी एक घटना और भी है –लेकिन जब आप अपना अनुभव लिखेंगी तब अगली बार ) मुबार्कबाद और मंगलकामनाये न्ये साल तक आने वाले सभी त्योहारों की बधाई :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :|

के द्वारा: Rajkamal Sharma

के द्वारा: manoranjanthakur

भारत में तो अनेक लोग ही तेल की तरह जीवन के दीयों में जल रहे हैं। दीपावली की रात देवी लक्ष्मी स्वदेश में ज्यादा दया दिखाएंगी या वेभी अप्रवासी भारतीयों के शानदार पूजा-पाठ से प्रभावित रहेंगी? बस्ती केटिमटिमाते दीयों पर कृपा होगी या अमीरों की अट्टालिकाओं को निहाल करेंगी? बहरहाल, अनेक समृद्ध भारतीय लोगों को दीपावली पर पटाखों के धुएं और शोर-शराबे से परहेज है, इसलिए वे सपरिवार विदेश जा रहे हैं। दरअसल त्योहारों पर भी आर्थिक उदारवाद और भौगोलीकरण का असरपड़ा है और त्योहार क्षेत्र व्यापक हो गया है। भारतीय दीये विदेशी शहरों में प्रकाश देंगे और भारत के अनेक घरों में चीन में बने दीये प्रकाश देंगे।वह दिन दूर नहीं जब लक्ष्मी पूजन के लिए बने व्यंजनों में चीनी पकवान शामिल होंगे। एक तरह से भारतीय आदर्श कि ‘पूरी दुनिया अब एकपरिवार’ है, सच होने जा रहा है। आगे जाकर ‘इंडिया’ विदेश में दीपावलीमनाएगा और साधनहीन ‘इंडिया’ भारत में रहेगा।

के द्वारा: mayurkota




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