नन्हें डग, लम्बी डगर...

कुछ भाव, जिन्हें शब्दों की आवाज़ दिए बिना रहा नहीं जाता...

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Timsy Mehta ( टिम्सी मेहता )


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मुझे मत मारो.. -Jagran Junction Forum

Posted On: 18 Apr, 2012  
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जंक्शन के साथ बिताए खट्टे-मीठे पल: फीडबैक [TM]

Posted On: 9 Apr, 2012  
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मेरा निर्णय…

Posted On: 7 Apr, 2012  
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वो मनुआ बेपरवाह…

Posted On: 28 Mar, 2012  
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Others मस्ती मालगाड़ी में

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वतन की उल्फत..

Posted On: 22 Mar, 2012  
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होली के बाद…

Posted On: 14 Mar, 2012  
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हमेशा तर्क नहीं…

Posted On: 7 Mar, 2012  
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असली राजा-नकली राजा

Posted On: 16 Feb, 2012  
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प्रेम कोई भिक्षुक नहीं है..

Posted On: 9 Feb, 2012  
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Others मेट्रो लाइफ में

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दुनिया गोरखधंधा है…

Posted On: 8 Feb, 2012  
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मीठे गन्ने का कड़वा रस..

Posted On: 1 Feb, 2012  
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रस-रूप-गंध महोत्सव!

Posted On: 24 Jan, 2012  
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मेरी सीख, मेरे लिए..

Posted On: 16 Jan, 2012  
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इस गुनगुनी धूप में . . .

Posted On: 10 Jan, 2012  
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मम्मी, सोने दो न!

Posted On: 3 Jan, 2012  
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ये त्योहार जिया जाए…

Posted On: 27 Dec, 2011  
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मेरी धरती, या वो तारा…

Posted On: 21 Dec, 2011  
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पहेली ही है जीवन…

Posted On: 13 Dec, 2011  
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हर फ़िक्र को धुंए में…

Posted On: 5 Dec, 2011  
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सर्दी का रोमांच

Posted On: 30 Nov, 2011  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

आप sentimental तो हैं पर sensitive बिल्कुल नहीं.......,अपने लिखा  'खबर पढ़ते भर ही आँखों में आँसू भर आते हैं.' .......ये कोई शुभ लक्षण नहीं है,,,,इससे कुछ होने वाला नहीं है.........और ये आँसू राजनीतिक है....ये दूसरों पर जिम्मेवारी थोपने का तरीका है.......लोग फिल्म देखने वक्त भी आँसू बहते है...... आगे आपने लिखा है, "हम यहाँ पढ़-सुनकर चार दर्द-भरी बातें बोलकर अपने-अपने जीवन में फिर से व्यस्त हो जायेंगे. पर कुछ प्रश्न अनुत्तरित छूट जायेंगे." .........होशियार तो आप है(अगर सब कुछ सही गया तो आप अच्छी राजनेता बन सकती है), अगर आपको ये सब पता है..... तो लोरी क्यों सुना रहीं है.......चोट कीजिए,,,,,,,लेखनी मे धार लाइए.....फिर ये दुख का राग अलापना बंद कीजिए ....... पता नहीं आपके अंदर लोगों से अच्छा कहलवाने कि इच्छा इतनी प्रगाढ़ क्यों है.......!

के द्वारा: follyofawiseman follyofawiseman

आपने लिखा, ' विनम्रता के मामले में सचिन तेंदुलकर जी का बहुत असर है मुझपर. वे कभी पलट कर आक्रोशित नहीं होते. कह दूं, की फिर भी असल जीवन में कुछ ख़ास विनम्र नहीं हूँ. बस कोशिश रहती है शांत रहने की.'.......  Beautiful, but just beautiful.....अगर हम सच मे विनम्र हो सकते है तो फिर नाटक करने की ज़रूरत क्या है.....? अच्छी बात है कि आपने सचिन 'जी' से विनम्रता गोद ली है,.....पर बच्चा गोद ले लेने भर से कोई स्त्री माँ नहीं बन सकती है.......! अपने लिखा 'असल जीवन'.........हिटलर ने अपनी आत्म कथा मे लिखा है कि अगर झूठ को भी बार बार दोहराया जाय तो वह सच जैसा प्रतीत होने लगता है.......अभी तो आपको ख्याल है कि आप असल जीवन मे विनम्र नहीं है.....पर जल्द ही ये ख़्याल मिट जाएगा...... आगे आपने कहीं लिखा है, "अति-सामान्य हूँ मैं."  आपका ज़ोर 'अति' पर है, क्या सिर्फ समान्य होना काफी नहीं है......? एक तरफ तो आप दावा करती है की आप समान्य है लेकिन उसमे भी भी आप 'अति' ज़ोर देतीं है....ये चालबाजी है,,,,,,,हम भारत के लोग शब्दों से खेलने मे बड़े कुशल है...... फिर आपने लिखा है..., "सौन्दर्य, ओर लेखन का तो कोई मेल न है, और न था. भविष्य का पता नहीं..''  हम वही सुन/पढ़ लेते है जो हम सुनना चाहते है,,,,,,मैंने आपकी लेख के सौंदर्य की बात की थी न की आपकी,,......आपकी लेख खजूर के पेड़ की तरह ऊँची तो थी पर छायादार नहीं....... आपके कुछ  शब्दों को पढ़ कर लगता है की आप इंसान नहीं कोई मशीन है रोबोट......मान्यवर, महोदय, आशीर्वाद, सादर, प्रणाम.........? क्या है ये सब.......?  अंतिम बात इस बार आपकी प्रतिक्रिया पढ़ कर थोड़ा बहुत मज़ा आया......और हाँ.....मैंने आपका लेख पढ़ लिया , लेकिन कमेंट बाद मे कर दूंगा......अभी मैं सोने जा रहा हूँ....शुभ night

के द्वारा: follyofawiseman follyofawiseman

आपने लिखा, ' विनम्रता के मामले में सचिन तेंदुलकर जी का बहुत असर है मुझपर. वे कभी पलट कर आक्रोशित नहीं होते. कह दूं, की फिर भी असल जीवन में कुछ ख़ास विनम्र नहीं हूँ. बस कोशिश रहती है शांत रहने की.'.......  Beautiful, but just beautiful.....अगर हम सच मे विनम्र हो सकते है तो फिर नाटक करने की ज़रूरत क्या है.....? अच्छी बात है कि आपने सचिन 'जी' से विनम्रता गोद ली है,.....पर बच्चा गोद ले लेने भर से कोई स्त्री माँ नहीं बन सकती है.......! अपने लिखा 'असल जीवन'.........हिटलर ने अपनी आत्म कथा मे लिखा है कि अगर झूठ को भी बार बार दोहराया जाय तो वह सच जैसा प्रतीत होने लगता है.......अभी तो आपको ख्याल है कि आप असल जीवन मे विनम्र नहीं है.....पर जल्द ही ये ख़्याल मिट जाएगा...... आगे आपने कहीं लिखा है, "अति-सामान्य हूँ मैं."  आपका ज़ोर 'अति' पर है, क्या सिर्फ समान्य होना काफी नहीं है......? एक तरफ तो आप दावा करती है की आप समान्य है लेकिन उसमे भी भी आप 'अति' ज़ोर देतीं है....ये चालबाजी है,,,,,,,हम भारत के लोग शब्दों से खेलने मे बड़े कुशल है...... फिर आपने लिखा है..., "सौन्दर्य, ओर लेखन का तो कोई मेल न है, और न था. भविष्य का पता नहीं..''  हम वही सुन/पढ़ लेते है जो हम सुनना चाहते है,,,,,,मैंने आपकी लेख के सौंदर्य की बात की थी न की आपकी,,......आपकी लेख खजूर के पेड़ की तरह ऊँची तो थी पर छायादार नहीं....... आपके कुछ  शब्दों को पढ़ कर लगता है की आप इंसान नहीं कोई मशीन है रोबोट......मान्यवर, महोदय, आशीर्वाद, सादर, प्रणाम.........? क्या है ये सब.......?  अंतिम बात इस बार आपकी प्रतिक्रिया पढ़ कर थोड़ा बहुत मज़ा आया......और हाँ.....मैंने आपका लेख पढ़ लिया , लेकिन कमेंट बाद मे कर दूंगा......अभी मैं सोने जा रहा हूँ....गुड night

के द्वारा: follyofawiseman follyofawiseman

आदरणीय  टिम्सी जी, यह घटना आपकी ही तरह मेरी भी आँखें द्रवित कर गईं। आपकी आँखें दुख  से द्रवित  हुईं होंगी, किन्तु मेरी क्रोध  से। क्रोध  अपने ऊपर  ही। क्या हम  कुछ  नहीं कर सकते। कुछ  लिख  दिया, लोगों की नचरों में संवेदनशील  बन  गये। और फिर भूल  गये उस  घटना को अपनी व्यस्तता की वजह से। क्या हम  इन आँसुओं को आग  नहीं बनी सकते। क्या हम  सब  मिलकर कोई सार्थक  प्रयास  नहीं कर सकते।    बात  बात  पर  फतवा देने लोग  कहाँ जाते हैं। क्यों नहीं इन मुद्दों पर अपना फतवा देते।     हम  कब तक  यूँ  ही लिखते रहेंगे..... बहिन  आपने अपने शब्दों से इस  घटना को और भी मार्मिक  बना दिया। सराहनीय  आलेख  पर बधाई.....

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

महोदय, आपकी टिप्पणी इस बार भी विवेकपूर्ण थी. इस सब पर मेरी प्रतिक्रिया.. आपने कहा १.)आप ज़रूरत से ज्यादा विनम्र है…… => विनम्रता के मामले में सचिन तेंदुलकर जी का बहुत असर है मुझपर. वे कभी पलट कर आक्रोशित नहीं होते. कह दूं, की फिर भी असल जीवन में कुछ ख़ास विनम्र नहीं हूँ. बस कोशिश रहती है शांत रहने की. :) २.) आप अच्छी जानकार है…..और आपकी कुशलता कमाल की है, शब्दो का ज्ञान भी अद्भुद है….. => आपकी टिप्पणी प्राप्त करने के बाद मैंने आपके ब्लॉग की ओर भी रूख किया था. आपकी जानकारी, कुशलता, और शाब्दिक धन देखकर मेरी तो बोलती ही बंद हो गयी. आप जैसे तीक्ष्ण बुद्धि व्यक्तित्व की और से ऐसी प्रतिक्रिया बहुत मायने रखती है. पर फिर भी, मेरा यही मानना है, की मेरी कलम में विकास की भारी जगह है. अति-सामान्य हूँ मैं. ३.) मुझे आपकी आलोचना करके मज़ा नहीं आया……इतने ऊँचे और बड़ी सोच वाले लोगों की आलोचना करना मुझे पसंद नहीं है……! इंसान हूँ और इंसानों से बात-चीत करना अच्छा लगता है…..! अंतिम बात, मैंने ने कहा था ’ सिर्फ सुंदर होना काफ़ी नहीं है…’ और बात मैंने किसी लेखक से कही थी, और वो भी स्त्री लेखक से…. मुझे आपकी औपचारिकता पसंद नहीं आई………..! => ऊंची, ओर बड़ी सोच.. ये तो मेरे लिए गले से न उतरने वाली बात है. आपकी सोच की ऊंचाई, दृढ़ता तो किसी को भी बौना दिखा दे.. यकीनन अगर आप खुद के स्तर के लोगों से बातचीत पसंद करते हैं, तो फिर आप बहुत कम बोलते होंगे.. :) "सिर्फ सुन्दर होना काफी नहीं है".. सौन्दर्य, ओर लेखन का तो कोई मेल न है, और न था. भविष्य का पता नहीं.. औपचारिकता की जहां तक बात है, तो आपकी प्रथम टिप्पणी जिस प्रकार राखी गयी थी, उसमे मेरे पास ऐसी ही प्रतिक्रिया की गुंजाइश थी.. आप ही देखें, जिस प्रकार आप "खुले दिल से मेरी सराहना कीजिएगा ताकि मैं और भी ऐसी खूबसूरत कविताएँ लिखने के लिए प्रेरित हो सकूँ……… " कह रहे हैं, उसमे आपने स्वयं ही इसे 'खूबसूरत' घोषित कर दिया है. अब कोई आपकी भावनाओं को तोडना क्यों चाहेगा! पर चूंकि इस बार आपने औपचारिकता को नापसंद कर दिया है, तो थोडा-सा अधिकार तो मुझे मिल ही गया है कुछ कहने का. मुझे इतना ही कहना है, की कला एक आतंरिक असंतोष की उत्पत्ति से हुआ करती है. इस असंतोष का कारण व्यक्ति-व्यक्ति में अलग-अलग हुआ करता है. अब हर व्यक्ति इसमें प्रखर-पारंगत नहीं होता, पर इसका मतलब यह भी नहीं है, की सामान्य होने पर वह इससे किनारा कर ले.. यहाँ, इस मंच पर शायद सब लोग आपके स्तर के न हों, पर शीर्ष पर स्थान होता ही इतना तंग है, की वहाँ केवल इक्का-दुक्का ही खड़े हो सकते हैं. आपकी कविता किस स्तर की थी, वह आप भी जानते हैं, और अधिकाँश पाठक भी जानते होंगे. पर लोक-नीति में व्यावहारिकता को बड़ा स्थान दिया गया है. किसी का सर्वथा खंडन करना किसी के लिए कठिन नहीं है. वैसे भी कहते हैं की उत्थान दुष्कर है. पतन तो सहज स्वभाव है ही. तो, किसी सीमा तक आपकी स्वयं की बातें भी उत्तरदायी हैं आपकी कविता के प्रति उपजी स्वीकृति पर. एक और बात कहनी है. बड़े-बड़े लेखक-मनीषी हुए हैं. बताइए, उनके विचारों के प्रभाव से कौन से चमत्कार हो पाए! यदि किसी युग के झेन गुरु आज के समाज से बुराई दूर नहीं कर सके, तो आज के साधारण लेखक किस पत्थर को हिलाने का दम रख पायेंगे. प्रयास हर हाल में होना ही चाहिए, पर चमत्कार की अपेक्षा न की जाए. आशा है, की औपचारिक-या अनौपचारिक, जैसे भी आप इसे समझें, ये बात आपके प्रश्नों का उत्तर दे पायी होगी. सादर धन्यवाद, स्वागत.

के द्वारा: Timsy Mehta ( टिम्सी मेहता ) Timsy Mehta ( टिम्सी मेहता )

मेरा मानना है कि केवल  टिप्पणी मिलने या न   मिलने से यह   सिद्ध   नहीं हो सकता कि रचना किस स्तर  की है। किन्तु व्यवहारिक  रूप से यह सत्य है कि रचनाकार को इससे प्रत्यसाहन  मिलता है। तथा आलोचनात्मक  प्रतिक्रिया से उसकी प्रतिभा में विकास  होता है। मैं जब से मंच  से जुड़ा हूं आपकी रचनाओं को पढ़ने से वंचित  नहीं हुआ। आपकी रचनाओं में प्रत्यक्ष  या अप्रत्यक्ष  रूप  से कोई न कोई संदेश  छिपा होता है। मैं ऐसी कई पोस्टो पर सामालोचनात्मक  या आलोचनात्मक  प्रतिक्रिया आवश्य ही देता हूँ। जिसे मैं समझता हूँ कि मेरा करना जरूरी है। चाहे वह  किसी के ब्लॉग  पर अपनी प्रतिक्रिया न देते हों। अपने अनुभवों का साझा करने के लिये आभार एवं बधाई...

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

एक पगले का साक्षात्कार आज तडके सवेरे जब मैं ख्यालों के बागीचे(जागरण जंक्शन ) में घुमने गया था तो वहां का मंज़र देख मैं हैरान रह गया …..विचारों के रंग-बिरंगे फूलों के बीच एक बड़ा ही बदरंग सा फूल भी था वहां ….’मेरे विमला मौसी का परिवार ,छोटू को आता बुखार’ जैसे बेतरीब शब्दों की कुछ बदशक्ल सी पखुरियां थीं उस फूल में …..और लोग हस्बे आदत उस फूल के स्तुति गान में लगे थे ,इस बात से बे-इल्म कि वह कविता दरअसल साहित्य की माखौल थी …..लेखक का नाम पढ़ते हीं मेरी पिल्ली चमक पड़ी ..ये तो अपने संदीप जी उर्फ़ wise man थे ….हमारे जंक्शन के इस होनहार लेखक ने ये क्या हाहाकार मचाया हुआ था ….wise man खामख्वाह का फितूर तो करते नहीं …अब इस अजीबोगरीब हरकत के पीछे क्या रहस्य है …मेरे कौतुहुलता ने कुचालें मारी और मैंने जंक्शन के कुछ और लेखकों का पन्ना पलट डाला …देखा कि हर जगह wise man की यह अजीबोगरीब सी कविता अपने खिसयानी दांत निपोड़े मुझे चिढ़ा रही थी …. …..ऐसे दोयम दर्जे की कविता उन्होंने क्यूँ लिखी ,मन में यह उथल-पुथल लिए मैं आ पहुंचा चाय की उस दूकान पे जिसका उपनाम है -’Defrurstration Point ‘ ….जल्दी से नाम के सार-गर्भिता की चर्चा करते हुए बताना चाहूँगा कि इसका ऐसा नाम इसलिए है क्यूंकि यहाँ तमाम वो स्वयंभू लेखक ,एक्टर ,डाइरेक्टर वगैरह आते हैं जिनकी खुद की परिभाषवली को छोड़कर उनके लिए लेखक ,एक्टर ,डाइरेक्टर जैसे शब्द कहीं और दर्ज नहीं हैं ….मुद्दे पे आया जाए ….चाय की दूकान पे मैंने देखा कि जंक्शन के वाल पे चस्पा हुआ wise man के passport photo जैसा एक आदमी बेफिक्री के आलम में बैठा मजे से चाय सुड़क रहा था ….दीदें फाड़ कर जरा और गौर से देखा तो अहसास हुआ कि यह wise man के passport photo जैसा आदमी नहीं बल्कि खुद wise man हीं था..सलाम-आदाब और एक दुसरे के तार्रुफ़ की तकल्लुफ के बाद मैंने एक लम्हा भी नहीं गंवाया उनसे वो सारे सवाल पूछने में जो जुलाब की तरह मेरे मन के उदर में हडकंप मचा रहा था …..मेरे लिए वह एक किस्म का साक्षात्कार हीं था …एक ऐसे आदमी का साक्षात्कार जिसके पागलपना का मैं बहुत बड़ा मुरीद हूँ….दोस्तों पेश है उस पागल के साक्षात्कार का लम्हां लम्हां बयां : पवन श्रीवास्तव-wise man यह आपन क्या कांड कर दिया है ? एक दोयम दर्जे की कविता को न केवल आपने अपने ब्लाग में पोस्ट किया है बल्कि कई लेखकों के वाल पे भी आपने इसे … wise man (बीच में टोकते हुए)-बहुत सोंच समझकर मैंने ऐसा किया है ….क्या होगा इससे …ज्यादा से ज्यादा मैं बदनाम हो जाऊंगा यही न ? मुझपर एक उच्श्रीन्खल कवि होने का आरोप लगेगा यही न ? तो सुन लीजिये पवन साहब यह ऐसा देश है जहाँ बदनामी की सीढियां चढ़ कर हीं सफलता मिलती है . पवन- पर साहित्यिक मर्यादा की तो आपन लाज रक्खी होती …कुछ नहीं तो अपने हिंदी प्रेम के खातिर इस तरह की उपस्तरिय रचनाएँ लिखने से बचते . wise man -अजी साहब यह थोथी दलील मत दीजिये …क्या होती है साहित्यिक मर्यादा ? आप जंक्शन के प्रथम पृष्ठ पे दृष्टिपात कीजिये …आपको वहां एक से बढ़कर एक ऐसे कूड़ लेखक मिल जायेंगे जिनकी बेहूदी कृतियाँ जंक्शन के प्रथम पृष्ठ की शोभा बढ़ा रही हैं …जिनपर लोग मुक्त हिर्दय से सराहनाएं बरसा रहे हैं और आपको इसी जंक्शन में कई उत्कृष्ट रचनाएँ भी मिल जाएँगी जो नीरवता के अनमने वातावरण में एकांतवास कर रही हैं ….कोई सराहने वाला नहीं उनको …कल रात जब मुझसे यह सब बर्दाश्त न हुआ तो मैंने जानबूझकर एक बेहूदी सी कविता रचकर वाल पे डाल दिया ….और मैं आश्वस्त था कि इस कविता को लोग खूब सराहेंगे ….क्यूंकि इसमें बेहूदी तुकबंदी है ,गहरे विचार नहीं हैं ….कल मैं खुजली वाले कुत्ते पे अपने पडोसी के ५ साल के बच्चे को कहूँगा कुछ तुकबंदी करे और उसे भी वाल पे डालूँगा …आप देखिएगा उसे कई अच्छे रचनाकारों के अच्छी रचनाओं से ज्यादा सराहना मिलेगी . ..भारत में किसी तरह कौतुहुलता पैदा कर दीजिये बस ..आप हिट हैं ….यहाँ अगर सड़क पे थूक फेंक कर भी कोई गौर से अपने हीं थूक को देखने लगता है तो लोगों कि भीड़ लग जाती है …कोई कहता है -चांदी का सिक्का है क्या ?…कोई कहता है स्वाति नक्षत्र कि बूंदे है क्या ? wise man कि बातें सुन मेरे मन ने कहा -यह आदमी धूर सत्य कह रहा है ….एक भुक्तभोगी तो मैं हीं हूँ …..जितने लोगों के बेहुदे पोस्ट पे कॉमेंट्स होते हैं उतने तो मेरे वाल पे visit भी नहीं होते …उन नहीफ सी पसंदगी को देखकर कौन कह सकता है कि मैं वही कवि हूँ जिसके गीतों को कैलाश खेर ,सोनू निगम जैसे अज़ीम गायकों का सुर मिला है …मैं वही कवि हूँ जिसकी लिखी गई रचना ने टीवी के रुपहले परदे पे खूब वाहवाहियां लूटी हैं ….कौन कह सकता है कि मैं वही कवि हूँ जिसकी रचना पढ़कर साहित्य जगत के एक सिरमौर ने जिसे ‘दूसरा माधव-मुक्तिबोध ‘ कि संज्ञा दी थी ….मेरे अंतर्मन में कोफ़्त तो मुझे भी होता है जब देखता हूँ अपने रचनाओं को धुल चाटते और उलूल-जुलूल रचनाओं को प्रशंसा बटोरते ….लोगों का अपने कुव्वत के हिसाब से लिखना बूरा नहीं..बूरा है अच्छे रचनाओं को नज़रंदाज़ कर किसी दोयम दर्जे की कविता पे ज़रूरत से ज्यादा कसीदे पढना …. ऐसा हीं एक दिलचस्प अनुभव बताता हूँ….एक साहब हैं जो अपने ब्लॉग का प्रचार करने करने के इरादे से हर किसी के वाल पे अपना यह कमेन्ट चिपकाते फिरते हैं (शर्तिया बगैर पढ़े )‘आपकी कविता ने मेरे दिल को छूआ है‘….कोई उनसे कहे की कम से कम समाचारों को तो वो अपने ऐसे कॉमेंट्स से बख्श दें ….उफ्फ ये स्वार्थ लोलुपता ,उफ्फ ये चाटुकारिता ,उफ्फ पाठकों की ये बेदानिश्गी . उस wiseman ने मेरी दुखती रग दबा दी थी ….मैंने आगश्ता आँखों से उसे एक नज़र देखा और चुपचाप लौट पड़ा अपने घर की तरफ अपनी लिखी एक पुरानी कविता को याद करते - एक हत्यारा कवि अपने साहित्यिक बोझ के साथ फांसी पर झूल गया और हिंदी के कई अनगिनत अनकहे शब्द निकलते गए कसते पाश के साथ विरल होते उसके कंठ से …. वो शब्द जो अनकहे थे जिसे कहना चाहा था कई बार उसने और कई बार तो चाहा था बेचना दो सूखे रोटियों के मोल पर , पर जिसे दो जोड़े कान न मिल सके दाम कैसे मिलते … वे शब्द जो कई बार प्रयासरत रहे हिंदी के चीर-परिचित अहिन्दी सम्मेलनों में कि अब उत्थान होगा अब उत्थान होगा … पर इन संकल्पों के कम्पन मशीनी माइकों के क्षीण होते हीं जाने कहाँ विलुप्त हो गए .. और अगली बार उपेक्षाओं की अगली कड़ी उस चाय की दूकान पे जब उसकी बौद्धिक क्षुधा सम्मान तलाशने लगी… वह जो अब तक धैर्य न खोया था भूख के विकटताओं में भी, … उस चाय कि दुकान पे हिंदी कि उपेक्षाओं ने उसे हत्यारा बना दिया पोस्ट स्क्रिप्ट- लौट कर देखूंगा कि मजाक मज़ाक में जो wiseman ne अपने wall पे विमला मौसी वाली तुकबंदी की है उसे कितने प्रशंसक मिलते हैं …क्या पाठकों की ज़मात में कोई इतना दानिशमंद मिल भी पायेगा जो यह समझ पाए की वह कविता नहीं है एक मज़ाक है. Pawan Srivastava

के द्वारा: follyofawiseman follyofawiseman

एक पगले का साक्षात्कार आज तडके सवेरे जब मैं ख्यालों के बागीचे(जागरण जंक्शन ) में घुमने गया था तो वहां का मंज़र देख मैं हैरान रह गया …..विचारों के रंग-बिरंगे फूलों के बीच एक बड़ा ही बदरंग सा फूल भी था वहां ….’मेरे विमला मौसी का परिवार ,छोटू को आता बुखार’ जैसे बेतरीब शब्दों की कुछ बदशक्ल सी पखुरियां थीं उस फूल में …..और लोग हस्बे आदत उस फूल के स्तुति गान में लगे थे ,इस बात से बे-इल्म कि वह कविता दरअसल साहित्य की माखौल थी …..लेखक का नाम पढ़ते हीं मेरी पिल्ली चमक पड़ी ..ये तो अपने संदीप जी उर्फ़ wise man थे ….हमारे जंक्शन के इस होनहार लेखक ने ये क्या हाहाकार मचाया हुआ था ….wise man खामख्वाह का फितूर तो करते नहीं …अब इस अजीबोगरीब हरकत के पीछे क्या रहस्य है …मेरे कौतुहुलता ने कुचालें मारी और मैंने जंक्शन के कुछ और लेखकों का पन्ना पलट डाला …देखा कि हर जगह wise man की यह अजीबोगरीब सी कविता अपने खिसयानी दांत निपोड़े मुझे चिढ़ा रही थी …. …..ऐसे दोयम दर्जे की कविता उन्होंने क्यूँ लिखी ,मन में यह उथल-पुथल लिए मैं आ पहुंचा चाय की उस दूकान पे जिसका उपनाम है -’Defrurstration Point ‘ ….जल्दी से नाम के सार-गर्भिता की चर्चा करते हुए बताना चाहूँगा कि इसका ऐसा नाम इसलिए है क्यूंकि यहाँ तमाम वो स्वयंभू लेखक ,एक्टर ,डाइरेक्टर वगैरह आते हैं जिनकी खुद की परिभाषवली को छोड़कर उनके लिए लेखक ,एक्टर ,डाइरेक्टर जैसे शब्द कहीं और दर्ज नहीं हैं ….मुद्दे पे आया जाए ….चाय की दूकान पे मैंने देखा कि जंक्शन के वाल पे चस्पा हुआ wise man के passport photo जैसा एक आदमी बेफिक्री के आलम में बैठा मजे से चाय सुड़क रहा था ….दीदें फाड़ कर जरा और गौर से देखा तो अहसास हुआ कि यह wise man के passport photo जैसा आदमी नहीं बल्कि खुद wise man हीं था..सलाम-आदाब और एक दुसरे के तार्रुफ़ की तकल्लुफ के बाद मैंने एक लम्हा भी नहीं गंवाया उनसे वो सारे सवाल पूछने में जो जुलाब की तरह मेरे मन के उदर में हडकंप मचा रहा था …..मेरे लिए वह एक किस्म का साक्षात्कार हीं था …एक ऐसे आदमी का साक्षात्कार जिसके पागलपना का मैं बहुत बड़ा मुरीद हूँ….दोस्तों पेश है उस पागल के साक्षात्कार का लम्हां लम्हां बयां : पवन श्रीवास्तव-wise man यह आपन क्या कांड कर दिया है ? एक दोयम दर्जे की कविता को न केवल आपने अपने ब्लाग में पोस्ट किया है बल्कि कई लेखकों के वाल पे भी आपने इसे … wise man (बीच में टोकते हुए)-बहुत सोंच समझकर मैंने ऐसा किया है ….क्या होगा इससे …ज्यादा से ज्यादा मैं बदनाम हो जाऊंगा यही न ? मुझपर एक उच्श्रीन्खल कवि होने का आरोप लगेगा यही न ? तो सुन लीजिये पवन साहब यह ऐसा देश है जहाँ बदनामी की सीढियां चढ़ कर हीं सफलता मिलती है . पवन- पर साहित्यिक मर्यादा की तो आपन लाज रक्खी होती …कुछ नहीं तो अपने हिंदी प्रेम के खातिर इस तरह की उपस्तरिय रचनाएँ लिखने से बचते . wise man -अजी साहब यह थोथी दलील मत दीजिये …क्या होती है साहित्यिक मर्यादा ? आप जंक्शन के प्रथम पृष्ठ पे दृष्टिपात कीजिये …आपको वहां एक से बढ़कर एक ऐसे कूड़ लेखक मिल जायेंगे जिनकी बेहूदी कृतियाँ जंक्शन के प्रथम पृष्ठ की शोभा बढ़ा रही हैं …जिनपर लोग मुक्त हिर्दय से सराहनाएं बरसा रहे हैं और आपको इसी जंक्शन में कई उत्कृष्ट रचनाएँ भी मिल जाएँगी जो नीरवता के अनमने वातावरण में एकांतवास कर रही हैं ….कोई सराहने वाला नहीं उनको …कल रात जब मुझसे यह सब बर्दाश्त न हुआ तो मैंने जानबूझकर एक बेहूदी सी कविता रचकर वाल पे डाल दिया ….और मैं आश्वस्त था कि इस कविता को लोग खूब सराहेंगे ….क्यूंकि इसमें बेहूदी तुकबंदी है ,गहरे विचार नहीं हैं ….कल मैं खुजली वाले कुत्ते पे अपने पडोसी के ५ साल के बच्चे को कहूँगा कुछ तुकबंदी करे और उसे भी वाल पे डालूँगा …आप देखिएगा उसे कई अच्छे रचनाकारों के अच्छी रचनाओं से ज्यादा सराहना मिलेगी . ..भारत में किसी तरह कौतुहुलता पैदा कर दीजिये बस ..आप हिट हैं ….यहाँ अगर सड़क पे थूक फेंक कर भी कोई गौर से अपने हीं थूक को देखने लगता है तो लोगों कि भीड़ लग जाती है …कोई कहता है -चांदी का सिक्का है क्या ?…कोई कहता है स्वाति नक्षत्र कि बूंदे है क्या ? wise man कि बातें सुन मेरे मन ने कहा -यह आदमी धूर सत्य कह रहा है ….एक भुक्तभोगी तो मैं हीं हूँ …..जितने लोगों के बेहुदे पोस्ट पे कॉमेंट्स होते हैं उतने तो मेरे वाल पे visit भी नहीं होते …उन नहीफ सी पसंदगी को देखकर कौन कह सकता है कि मैं वही कवि हूँ जिसके गीतों को कैलाश खेर ,सोनू निगम जैसे अज़ीम गायकों का सुर मिला है …मैं वही कवि हूँ जिसकी लिखी गई रचना ने टीवी के रुपहले परदे पे खूब वाहवाहियां लूटी हैं ….कौन कह सकता है कि मैं वही कवि हूँ जिसकी रचना पढ़कर साहित्य जगत के एक सिरमौर ने जिसे ‘दूसरा माधव-मुक्तिबोध ‘ कि संज्ञा दी थी ….मेरे अंतर्मन में कोफ़्त तो मुझे भी होता है जब देखता हूँ अपने रचनाओं को धुल चाटते और उलूल-जुलूल रचनाओं को प्रशंसा बटोरते ….लोगों का अपने कुव्वत के हिसाब से लिखना बूरा नहीं..बूरा है अच्छे रचनाओं को नज़रंदाज़ कर किसी दोयम दर्जे की कविता पे ज़रूरत से ज्यादा कसीदे पढना …. ऐसा हीं एक दिलचस्प अनुभव बताता हूँ….एक साहब हैं जो अपने ब्लॉग का प्रचार करने करने के इरादे से हर किसी के वाल पे अपना यह कमेन्ट चिपकाते फिरते हैं (शर्तिया बगैर पढ़े )‘आपकी कविता ने मेरे दिल को छूआ है‘….कोई उनसे कहे की कम से कम समाचारों को तो वो अपने ऐसे कॉमेंट्स से बख्श दें ….उफ्फ ये स्वार्थ लोलुपता ,उफ्फ ये चाटुकारिता ,उफ्फ पाठकों की ये बेदानिश्गी . उस wiseman ने मेरी दुखती रग दबा दी थी ….मैंने आगश्ता आँखों से उसे एक नज़र देखा और चुपचाप लौट पड़ा अपने घर की तरफ अपनी लिखी एक पुरानी कविता को याद करते - एक हत्यारा कवि अपने साहित्यिक बोझ के साथ फांसी पर झूल गया और हिंदी के कई अनगिनत अनकहे शब्द निकलते गए कसते पाश के साथ विरल होते उसके कंठ से …. वो शब्द जो अनकहे थे जिसे कहना चाहा था कई बार उसने और कई बार तो चाहा था बेचना दो सूखे रोटियों के मोल पर , पर जिसे दो जोड़े कान न मिल सके दाम कैसे मिलते … वे शब्द जो कई बार प्रयासरत रहे हिंदी के चीर-परिचित अहिन्दी सम्मेलनों में कि अब उत्थान होगा अब उत्थान होगा … पर इन संकल्पों के कम्पन मशीनी माइकों के क्षीण होते हीं जाने कहाँ विलुप्त हो गए .. और अगली बार उपेक्षाओं की अगली कड़ी उस चाय की दूकान पे जब उसकी बौद्धिक क्षुधा सम्मान तलाशने लगी… वह जो अब तक धैर्य न खोया था भूख के विकटताओं में भी, … उस चाय कि दुकान पे हिंदी कि उपेक्षाओं ने उसे हत्यारा बना दिया पोस्ट स्क्रिप्ट- लौट कर देखूंगा कि मजाक मज़ाक में जो wiseman ne अपने wall पे विमला मौसी वाली तुकबंदी की है उसे कितने प्रशंसक मिलते हैं …क्या पाठकों की ज़मात में कोई इतना दानिशमंद मिल भी पायेगा जो यह समझ पाए की वह कविता नहीं है एक मज़ाक है. Pawan Srivastava (Lap Top Wala Soofi)

के द्वारा: follyofawiseman follyofawiseman

आपने मुझे जवाब देते हुए लिखा है..."मान्यवर, आपके विवेकपूर्ण विचार पढ़े. मेरा भी ऐसा बिलकुल मानना नहीं है, .......................................................................................................आपकी आलोचना का सादर, सदा ही स्वागत है. आगे भी ऐसा ही आशीष मिलता रहे, तो बहुत प्रसन्नता होगी." दो-तीन बातें मुझे कहनी है, फिर मैं सोने चला जाऊँगा....... 1) आप ज़रूरत से ज्यादा विनम्र है...... 2) आप अच्छी जानकार है.....और आपकी कुशलता कमाल की है, शब्दो का ज्ञान भी अद्भुद है..... 3) मुझे आपकी आलोचना करके मज़ा नहीं आया......इतने ऊँचे और बड़ी सोच वाले लोगों की आलोचना करना मुझे पसंद नहीं है......! इंसान हूँ और इंसानों से बात-चीत करना अच्छा लगता है.....! अंतिम बात, मैंने ने कहा था ' सिर्फ सुंदर होना काफ़ी नहीं है...' और बात मैंने किसी लेखक से कही थी, और वो भी स्त्री लेखक से.... मुझे आपकी औपचारिकता पसंद नहीं आई...........! Good Night ( it's 2:51am, now, I must go to sleep now)

के द्वारा: follyofawiseman follyofawiseman

आप इसे ज़रूर पढ़िएगा फिर शायद आपको मेरी कविता समझ मे आ जाए एक पगले का साक्षात्कार आज तडके सवेरे जब मैं ख्यालों के बागीचे(जागरण जंक्शन ) में घुमने गया था तो वहां का मंज़र देख मैं हैरान रह गया …..विचारों के रंग-बिरंगे फूलों के बीच एक बड़ा ही बदरंग सा फूल भी था वहां ….’मेरे विमला मौसी का परिवार ,छोटू को आता बुखार’ जैसे बेतरीब शब्दों की कुछ बदशक्ल सी पखुरियां थीं उस फूल में …..और लोग हस्बे आदत उस फूल के स्तुति गान में लगे थे ,इस बात से बे-इल्म कि वह कविता दरअसल साहित्य की माखौल थी …..लेखक का नाम पढ़ते हीं मेरी पिल्ली चमक पड़ी ..ये तो अपने संदीप जी उर्फ़ wise man थे ….हमारे जंक्शन के इस होनहार लेखक ने ये क्या हाहाकार मचाया हुआ था ….wise man खामख्वाह का फितूर तो करते नहीं …अब इस अजीबोगरीब हरकत के पीछे क्या रहस्य है …मेरे कौतुहुलता ने कुचालें मारी और मैंने जंक्शन के कुछ और लेखकों का पन्ना पलट डाला …देखा कि हर जगह wise man की यह अजीबोगरीब सी कविता अपने खिसयानी दांत निपोड़े मुझे चिढ़ा रही थी …. …..ऐसे दोयम दर्जे की कविता उन्होंने क्यूँ लिखी ,मन में यह उथल-पुथल लिए मैं आ पहुंचा चाय की उस दूकान पे जिसका उपनाम है -’Defrurstration Point ‘ ….जल्दी से नाम के सार-गर्भिता की चर्चा करते हुए बताना चाहूँगा कि इसका ऐसा नाम इसलिए है क्यूंकि यहाँ तमाम वो स्वयंभू लेखक ,एक्टर ,डाइरेक्टर वगैरह आते हैं जिनकी खुद की परिभाषवली को छोड़कर उनके लिए लेखक ,एक्टर ,डाइरेक्टर जैसे शब्द कहीं और दर्ज नहीं हैं ….मुद्दे पे आया जाए ….चाय की दूकान पे मैंने देखा कि जंक्शन के वाल पे चस्पा हुआ wise man के passport photo जैसा एक आदमी बेफिक्री के आलम में बैठा मजे से चाय सुड़क रहा था ….दीदें फाड़ कर जरा और गौर से देखा तो अहसास हुआ कि यह wise man के passport photo जैसा आदमी नहीं बल्कि खुद wise man हीं था..सलाम-आदाब और एक दुसरे के तार्रुफ़ की तकल्लुफ के बाद मैंने एक लम्हा भी नहीं गंवाया उनसे वो सारे सवाल पूछने में जो जुलाब की तरह मेरे मन के उदर में हडकंप मचा रहा था …..मेरे लिए वह एक किस्म का साक्षात्कार हीं था …एक ऐसे आदमी का साक्षात्कार जिसके पागलपना का मैं बहुत बड़ा मुरीद हूँ….दोस्तों पेश है उस पागल के साक्षात्कार का लम्हां लम्हां बयां : पवन श्रीवास्तव-wise man यह आपन क्या कांड कर दिया है ? एक दोयम दर्जे की कविता को न केवल आपने अपने ब्लाग में पोस्ट किया है बल्कि कई लेखकों के वाल पे भी आपने इसे … wise man (बीच में टोकते हुए)-बहुत सोंच समझकर मैंने ऐसा किया है ….क्या होगा इससे …ज्यादा से ज्यादा मैं बदनाम हो जाऊंगा यही न ? मुझपर एक उच्श्रीन्खल कवि होने का आरोप लगेगा यही न ? तो सुन लीजिये पवन साहब यह ऐसा देश है जहाँ बदनामी की सीढियां चढ़ कर हीं सफलता मिलती है . पवन- पर साहित्यिक मर्यादा की तो आपन लाज रक्खी होती …कुछ नहीं तो अपने हिंदी प्रेम के खातिर इस तरह की उपस्तरिय रचनाएँ लिखने से बचते . wise man -अजी साहब यह थोथी दलील मत दीजिये …क्या होती है साहित्यिक मर्यादा ? आप जंक्शन के प्रथम पृष्ठ पे दृष्टिपात कीजिये …आपको वहां एक से बढ़कर एक ऐसे कूड़ लेखक मिल जायेंगे जिनकी बेहूदी कृतियाँ जंक्शन के प्रथम पृष्ठ की शोभा बढ़ा रही हैं …जिनपर लोग मुक्त हिर्दय से सराहनाएं बरसा रहे हैं और आपको इसी जंक्शन में कई उत्कृष्ट रचनाएँ भी मिल जाएँगी जो नीरवता के अनमने वातावरण में एकांतवास कर रही हैं ….कोई सराहने वाला नहीं उनको …कल रात जब मुझसे यह सब बर्दाश्त न हुआ तो मैंने जानबूझकर एक बेहूदी सी कविता रचकर वाल पे डाल दिया ….और मैं आश्वस्त था कि इस कविता को लोग खूब सराहेंगे ….क्यूंकि इसमें बेहूदी तुकबंदी है ,गहरे विचार नहीं हैं ….कल मैं खुजली वाले कुत्ते पे अपने पडोसी के ५ साल के बच्चे को कहूँगा कुछ तुकबंदी करे और उसे भी वाल पे डालूँगा …आप देखिएगा उसे कई अच्छे रचनाकारों के अच्छी रचनाओं से ज्यादा सराहना मिलेगी . ..भारत में किसी तरह कौतुहुलता पैदा कर दीजिये बस ..आप हिट हैं ….यहाँ अगर सड़क पे थूक फेंक कर भी कोई गौर से अपने हीं थूक को देखने लगता है तो लोगों कि भीड़ लग जाती है …कोई कहता है -चांदी का सिक्का है क्या ?…कोई कहता है स्वाति नक्षत्र कि बूंदे है क्या ? wise man कि बातें सुन मेरे मन ने कहा -यह आदमी धूर सत्य कह रहा है ….एक भुक्तभोगी तो मैं हीं हूँ …..जितने लोगों के बेहुदे पोस्ट पे कॉमेंट्स होते हैं उतने तो मेरे वाल पे visit भी नहीं होते …उन नहीफ सी पसंदगी को देखकर कौन कह सकता है कि मैं वही कवि हूँ जिसके गीतों को कैलाश खेर ,सोनू निगम जैसे अज़ीम गायकों का सुर मिला है …मैं वही कवि हूँ जिसकी लिखी गई रचना ने टीवी के रुपहले परदे पे खूब वाहवाहियां लूटी हैं ….कौन कह सकता है कि मैं वही कवि हूँ जिसकी रचना पढ़कर साहित्य जगत के एक सिरमौर ने जिसे ‘दूसरा माधव-मुक्तिबोध ‘ कि संज्ञा दी थी ….मेरे अंतर्मन में कोफ़्त तो मुझे भी होता है जब देखता हूँ अपने रचनाओं को धुल चाटते और उलूल-जुलूल रचनाओं को प्रशंसा बटोरते ….लोगों का अपने कुव्वत के हिसाब से लिखना बूरा नहीं..बूरा है अच्छे रचनाओं को नज़रंदाज़ कर किसी दोयम दर्जे की कविता पे ज़रूरत से ज्यादा कसीदे पढना …. ऐसा हीं एक दिलचस्प अनुभव बताता हूँ….एक साहब हैं जो अपने ब्लॉग का प्रचार करने करने के इरादे से हर किसी के वाल पे अपना यह कमेन्ट चिपकाते फिरते हैं (शर्तिया बगैर पढ़े )‘आपकी कविता ने मेरे दिल को छूआ है‘….कोई उनसे कहे की कम से कम समाचारों को तो वो अपने ऐसे कॉमेंट्स से बख्श दें ….उफ्फ ये स्वार्थ लोलुपता ,उफ्फ ये चाटुकारिता ,उफ्फ पाठकों की ये बेदानिश्गी . उस wiseman ने मेरी दुखती रग दबा दी थी ….मैंने आगश्ता आँखों से उसे एक नज़र देखा और चुपचाप लौट पड़ा अपने घर की तरफ अपनी लिखी एक पुरानी कविता को याद करते - एक हत्यारा कवि अपने साहित्यिक बोझ के साथ फांसी पर झूल गया और हिंदी के कई अनगिनत अनकहे शब्द निकलते गए कसते पाश के साथ विरल होते उसके कंठ से …. वो शब्द जो अनकहे थे जिसे कहना चाहा था कई बार उसने और कई बार तो चाहा था बेचना दो सूखे रोटियों के मोल पर , पर जिसे दो जोड़े कान न मिल सके दाम कैसे मिलते … वे शब्द जो कई बार प्रयासरत रहे हिंदी के चीर-परिचित अहिन्दी सम्मेलनों में कि अब उत्थान होगा अब उत्थान होगा … पर इन संकल्पों के कम्पन मशीनी माइकों के क्षीण होते हीं जाने कहाँ विलुप्त हो गए .. और अगली बार उपेक्षाओं की अगली कड़ी उस चाय की दूकान पे जब उसकी बौद्धिक क्षुधा सम्मान तलाशने लगी… वह जो अब तक धैर्य न खोया था भूख के विकटताओं में भी, … उस चाय कि दुकान पे हिंदी कि उपेक्षाओं ने उसे हत्यारा बना दिया पोस्ट स्क्रिप्ट- लौट कर देखूंगा कि मजाक मज़ाक में जो wiseman ne अपने wall पे विमला मौसी वाली तुकबंदी की है उसे कितने प्रशंसक मिलते हैं …क्या पाठकों की ज़मात में कोई इतना दानिशमंद मिल भी पायेगा जो यह समझ पाए की वह कविता नहीं है एक मज़ाक है. Pawan Srivastava (Lap Top Wala Soofi)

के द्वारा: follyofawiseman follyofawiseman

आपकी प्रतिक्रिया से सहमत हूँ. यह लेख "well-dressed but nowhere to go" तो है, पर देखने की बात है, ki .मन के उल्लास की बात उठायी गयी है. ध्यान, योग, ईश्वरत्व को लक्षित किया जाता है मन की प्रसन्नता के लिए.. पर प्रकृति से साहचर्य से दूर होकर उसे कोई कैसे टटोलेगा! मैंने यही भाव मन में रखते हुए यह रचना प्रस्तुत की थी, की हमारे इर्द-गिर्द वह प्राकृतिक आशीष बहे जा रहा है, पर हम पता नहीं किस दिशा में उसे खंगालने में जुटे हैं.. आतंरिक शान्ति जब मिल रही हो, तो यह प्रश्न व्यर्थ है, की वह द्वैतवाद का फल है, अद्वैतवाद का, अथवा शून्यवाद का.. जैसे, भीषण प्यास के समय हम यह नहीं देखते की हम किसी दिशा में खड़े होकर पानी पियें. प्यास बुझने से तात्पर्य होना चाहिए, न की दिशा-बोध से. जल-पात्र किस धातु से निर्मित है, यह जानने भर से प्यास से निवृति संभव नहीं है. इसका उपाय तो केवल जल पीना ही है. मुझे प्रकृति के निकट वह प्रिय-shrey  अनुभूति होती है, सो उसका फल यह अभिव्यक्ति है.. बाकि.. जाकी रही भावना जैसी, प्रभु-मूरत देखि तिन तैसी.. आपके द्वारा प्रदत्त प्रशंसा एवं आलोचना दोनों का सहर्ष स्वागत है.. सादर धन्यवाद.

के द्वारा: Timsy Mehta ( टिम्सी मेहता ) Timsy Mehta ( टिम्सी मेहता )

के द्वारा: Timsy Mehta ( टिम्सी मेहता ) Timsy Mehta ( टिम्सी मेहता )

टिम्सी बहिन ...... नमस्कारम ! सबसे पहले तो पाठक आपका अजीब नाम देख कर आपके ब्लॉग पर चला आता है उसके बाद जब रचना को पढ़ता है तो पाता है कि अरे ! यह तो नीची दूकान मीठा पकवान ! निकला ..... चलते चलते एक राजकमलिया जोक:- एक ब्लागर का जब आखिरी समय निकट आ गया तो उनसे मैंने कहा कि अपने मुंह से तीन बार राम ! राम ! राम ! का उच्चारण कीजिये उन्होंने इशारे से बतलाया कि यह तो असम्भव और नामुमकिन है ...... तब मुझको थोड़ा सा गुस्सा आ गया और मैंने भी कह दिया कि गांधी जी को गोली लगी थी फिर भी उनके मुख से राम नाम निकला था और आप ?...... तब उन्होंने बहुत ही मुश्किल से जो शब्द कहे थे वोह मुझको आजीवन याद रहेंगे:- “ कमेन्ट ! कमेन्ट !! कमेन्ट !!! :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :|

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

सादर नमस्कार! आपने दो और लो वाली बात उठाई...वो सार्थक बिंदु हैं....मेरा मानना हैं कि मुझे वही ब्लाग पढ़ना चाहिए जो मुझे अच्छा लगता है. ऐसे बहुत से ब्लागेर हैं जिन पर नियमित कमेन्ट करता हूँ जबकि उनका कमेन्ट मुझ पर नहीं आता है. कारण उनके विषय वस्तु मुझे पसंद आते हैं. पर मैं उनका बुरा नहीं मानता और नहीं कोई अपेक्षा रहती हैं. कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनका कमेन्ट मुझे मिलता हैं पर मुझे उनके विषय वस्तु पसंद नहीं आती. अतः मैं कमेन्ट नहीं करता. हरेक आदमी की अपनी सोच होती हैं. मुझे लगता है कि इसमें किसी को बुरा नहीं मानना चाहिए.........एक बार फिर सुन्दर और समालोचनात्मक लेख लिखने के लिए......बधाई और हार्दिक आभार.

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: Bhupender S Negi Bhupender S Negi

हर मौसम की अपनी खट्टी-मीठी प्यारी बातें होती हैं. अपनी लेखनी से माध्यम से आपने उन्हें चित्रित किया है. एक सुन्दर कविता की यह खूबी होती है, की उसके शब्द पढ़ते हुए हम उन्हें जीने लगते हैं. तो.. आम के अचार की खटास, तुलसी की खुशबू अपने आस-पास महसूस होने लगी है. और क्या प्रमाण होगा अच्छी रचना का..! बहुत गम्भीरता के साथ आपकी यह कविता कई बार पढ़ी. और भी बहुत कुछ कहने का मन हो रहा है. दरअसल, एक प्रश्न उठ रहा है. कविता की आवश्यकता ही क्या है.. मेरी दृष्टि में, कविता इसलिए नहीं हुआ करती, की सुन्दर, लच्छेदार, अलंकृत भाषा में लय, और ताल इत्यादि के प्रयोग से एक रचना कर दी जाए, जो प्रशंसा दिला सके.. ये तो मन के कुछ बादल होते हैं, जो बरसना चाहते हैं. हर कवी यह चाह करे, की उसकी कविता के सौन्दर्य पर दुनिया रीझ जाए, तो वह तो कवी का बचपना ही कहलायेगा. हर बार सराहना मिलना न मिलना इस बात का भी द्योतक नहीं है, की रचना अच्छी है या बुरी. क्योंकि पढने वाला अपने अनुभवों की रौशनी में पढ़ेगा, अपनी मनमर्जी से उस पर विचार देगा. इसलिए, अपनी रचना का अंकन तो खुद ही करना सबसे पहली अक्लमंदी है. दुसरे हमारे नज़रिए को प्रभावित तो कर सकते हैं, पर उसका निर्माण करने वाले न हो जाएँ. आपकी यह कविता गुनगुनाने के लिहाज़ से प्यारी है. इसमें एक बालमन का सा कच्चापन है. सबसे अच्छी बात, की इसमें वह गंभीरता नहीं है, जो किसी जागते को सुला दे. इतनी लम्बी बात करने के पीछे बस इतना ही मकसद है, की यह बता सकूं, की यदि कोई इस रचना को नापसंद कर दे, तो बुरा न मानियेगा. लिखते रहें. ऐसे साहित्य की अपनी जगह है. हर कोई शायद न समझ पाए. सादर.

के द्वारा: Timsy Mehta ( टिम्सी मेहता ) Timsy Mehta ( टिम्सी मेहता )

मान्यवर, आपके विवेकपूर्ण विचार पढ़े. मेरा भी ऐसा बिलकुल मानना नहीं है, की मैंने कुछ अच्छा लिखा है. बस, एक कोशिश-भर होती है छोटे-छोटे विचारों को अभिव्यक्त करने की. फिर भी, ऐसा नहीं है, की मेरा अपना कोई नजरिया नहीं होता. मेरे विचार बहुत स्पष्ट हैं. लेकिन पाठकों पर मेरा कोई आग्रह नहीं होता, की वे इन्हें यथावत स्वीकारें. सबका अपना स्वतंत्र नजरिया है. विचारों की भूमि पर खड़े होकर न जाने कब कौन कैसा महल रच डाले.. न जाने कौन सा बीज कहाँ किस वृक्ष में परिवर्तित हो जाए..! और मुझे अपनी अल्प बुद्धि से अधिक विश्वास अपने प्रखर पाठकों की समझ पर है. वे संकेत भी समझ लेते हैं, शब्दों के पीछे छद्म भावों को भी देख पाते हैं. छद्म, अनकहे भाव कहे गए शब्दों से ज्यादा प्रभावी होते हैं, ऐसा मेरा मानना है. फिर भी, आप न समझे, तो शायद मेरे समझाने में कोई कमी रही होगी. क्षमाप्रार्थी हूँ. पर अच्छा लग रहा है. कुछ बेहतर लिख पाने का एक नया बल खुद में दिख रहा है. वैसे, लखा प्रशाद जी की विडंबना कुछ समझ नहीं आ पायी. स्वर्ग-नरक या तो है, या नहीं. पर किसी की निजी मान्यताएं तो स्वर्ग-नरक के अस्तित्व को प्रभावित नहीं कर सकती. यदि स्वर्ग-नरक हैं, तो लखा प्रशाद जी को कर्मों के अनुसार वहाँ जाना ही पड़ेगा, फिर चाहे वो well-dressed थे, या फूहड़.. ...आगे कोशिश रहेगी की कुछ अच्छा कर पाऊं, बेहतर लिख पाऊं. आपके द्वारा प्रदत्त प्रशंसा के शब्दों के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद.. सचमुच उत्साहवर्धन हुआ. और आलोचना की प्रतीक्षा रहेगी. आपकी आलोचना का सादर, सदा ही स्वागत है. आगे भी ऐसा ही आशीष मिलता रहे, तो बहुत प्रसन्नता होगी. सादर धन्यवाद.

के द्वारा: Timsy Mehta ( टिम्सी मेहता ) Timsy Mehta ( टिम्सी मेहता )

दो तीन दिन पहले मैंने आपकी कुछ रचनाओं को पढ़ा था, लेकिन कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं कर पाया....आज मैं किसी दूसरे लेखक की रचना को पढ़ रहा था, उसी दौरान मेरी नज़र आपकी एक लेख 'वो मनुआ बेपरवाह' पर पड़ी, और मैंने आपको दुबारा पढ़ने की सोची,......और इस बार आप ही की भाषा मे, कुछ भाव भाव उठे हैं मेरे भीतर , जिन्हें शब्दों की आवाज़ दिए बिना रहा नहीं जा सकता है....…लेकिन मुझे ठीक ठीक साफ नहीं हो रहा हैं कि आख़िर लिखूँ क्या.... एक तरह से मैंने आपकी तारीफ़ कर दी है......अब आलोचन करनी बाँकी है,,,,लेकिन मेरा मन अभी आलोचना करने का नहीं है....... चलिए मैं आपको अपने मन कि कुछ कहता हूँ.......(इतनी परेशानी मुझे आज तक किसी पर कमेंट करने मे नहीं हुई ,आपकी रचनाएँ कुछ इस तरह की हैं कि न तो खुले दिल से तारीफ़ की जा सकती हैं और न ही आलोचना....) मुझे लख्खा प्रसाद जी की एक कहानी याद आ रही है, श्रीमान लख्खा प्रसाद जी, बड़े ही अच्छे आदमी थे, लेकिन उनमे कुछ बातें अजीब थी, वो न तो आस्तिक थे और न ही नास्तिक,,,,,जब उनकी मृत्यु हुई तो उनकी पत्तनी दहाड़े मार-मार, लख्खा प्रसाद जी की खूब अच्छे से सजी-धजी लाश के सामने रोने लगी,....लोगों ने उसको समझाया, "यार इसमे इतना रोने कि ज़रूरत क्या है,,,,,जब जिंदा था तो कौन सा तुम्हें सुख देता था, उल्टे दारू पी कर तुम्हें मारता-पीटता था, अब जियादा मत रोओ " वो बेचारी स्त्री आँसू पोछते हुए बोली, “मैं इस लिए थोड़े न रो रहीं हूँ कि ये मर गया है,,,,मैं तो इसलिए रो रही हूँ कि अब ये जाएगा कहा.....न तो ये स्वर्ग जा सकता हैं और न ही नर्क....”well-dressed but nowhere to go…” ! सिर्फ सुंदर होना काफी नहीं है......

के द्वारा: follyofawiseman follyofawiseman

दो तीन दिन पहले मैंने आपकी कुछ रचनाओं को पढ़ा था, लेकिन कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं कर पाया....आज मैं किसी दूसरे लेखक की रचना को पढ़ रहा था, उसी दौरान मेरी नज़र आपकी एक लेख 'वो मनुआ बेपरवाह' पर पड़ी, और मैंने आपको दुबारा पढ़ने की सोची,......और इस बार आप ही की भाषा मे, कुछ भाव भाव उठे हैं मेरे भीतर , जिन्हें शब्दों की आवाज़ दिए बिना रहा नहीं जा सकता है....…लेकिन मुझे ठीक ठीक साफ नहीं हो रहा हैं कि आख़िर लिखूँ क्या.... एक तरह से मैंने आपकी तारीफ़ कर दी है......अब आलोचन करनी बाँकी है,,,,लेकिन मेरा मन अभी आलोचना करने का नहीं है....... चलिए मैं आपको अपने मन कि कुछ कहता हूँ.......(इतनी परेशानी मुझे आज तक किसी पर कमेंट करने मे नहीं हुई ,आपकी रचनाएँ कुछ इस तरह की हैं कि न तो खुले दिल से तारीफ़ की जा सकती हैं और न ही आलोचना....) मुझे लख्खा प्रसाद जी की एक कहानी याद आ रही है, श्रीमान लख्खा प्रसाद जी, बड़े ही अच्छे आदमी थे, लेकिन उनमे कुछ बातें अजीब थी, वो न तो आस्तिक थे और न ही नास्तिक,,,,,जब उनकी मृत्यु हुई तो उनकी पत्तनी दहाड़े मार-मार, लख्खा प्रसाद जी की खूब अच्छे से सजी-धजी लाश के सामने रोने लगी,....लोगों ने उसको समझाया, "यार इसमे इतना रोने कि ज़रूरत क्या है,,,,,जब जिंदा था तो कौन सा तुम्हें सुख देता था, उल्टे दारू पी कर तुम्हें मारता-पीटता था, अब जियादा मत रोओ " वो बेचारी स्त्री आँसू पोछते हुए बोली, “मैं इस लिए थोड़े न रो रहीं हूँ कि ये मर गया है,,,,मैं तो इसलिए रो रही हूँ कि अब ये जाएगा कहा.....न तो ये स्वर्ग जा सकता हैं और न ही नर्क....”well-dressed but nowhere to go…” ! सिर्फ सुंदर होना काफी नहीं है......

के द्वारा: follyofawiseman follyofawiseman

वैसे तो मैं मूलतः कवि नहीं हूँ, किन्तु जागरण जंक्शन के कुछ कवियों से प्रेरित हो कर कविता लिखने का प्रथम प्रयास कर रहा हूँ, कविता अगर पसंद आए तो खुले दिल से मेरी सराहना कीजिएगा ताकि मैं और भी ऐसी खूबसूरत कविताएँ लिखने के लिए प्रेरित हो सकूँ..........आपका Wise Man ! ऊपर आम का छतनार, नीचे हरे घास हज़ार, और वन-तुलसी की लताएँ करने गलबहियाँ तैयार, लेके चाकू और कटार, जब हो ओलो का प्रहार, बिमला मौसी का परिवार, चुने टोकरी मे अमियाँ फिर डाले उनका आचार... यह खेल चले दो तीन महीने लगातार.... फिर आए जाड़े का मौसम, पड़े शीत की मार, छोटू को हो जाए बुखार..... डॉक्टर की दवाई फिर करे छोटू का उद्धार..... फिर आए गर्मी की ललकार, सर्वत्र मचे हाहाकार, और जब लाइट न हो और हो पंखे की दरकार, मचाए सब चीख-पुकार, चले प्रक्रिया यह बारंबार, फिर आए बसंती बहार, इस मौसम के बारे में मैं कहूँगा अगली बार...... तब तक के लिए मेरा सादर नमस्कार.....

के द्वारा: follyofawiseman follyofawiseman

के द्वारा: Timsy Mehta ( टिम्सी मेहता ) Timsy Mehta ( टिम्सी मेहता )

के द्वारा: Timsy Mehta ( टिम्सी मेहता ) Timsy Mehta ( टिम्सी मेहता )

टिम्सी जी सादर नमस्कार, शहीद भगत सिंह की पुण्य तिथि पर वीर भगतसिंह सहित सभी शहीद वीर सपूतों को सादर नमन. जब नेहरु की चिता की राख खेतों में बिखेरी गयी थी तब निर्मुख धरती ने अन्न ना उपजाकर सारी सच्चाई बयान कर दी थी.किन्तु हम आज तक उस सच्चाई को समझ नहीं पा रहे हैं.जहां वीर सपूतों ने तन लुटाकर प्रसिद्धि पायी है वहीँ नेहरु जैसे नेताओं ने धन दिखाकर प्रसिद्धि पायी है. वीर सपूतों को देश नमन करता है किन्तु हमारा यह सोचना कि फिर कोई वीर सपूत आएगा निरर्थक है क्योंकि कोई वीर सपूत अब नहीं आयेगा. हमको ही उन वीर सपूतों की ज्योत से अपने मन में भी ज्योत जलानी होगी कोई और ज्योत अब प्रज्वलित नहीं होगी. समयानुकूल सार्थक आलेख बधाई.

के द्वारा: akraktale akraktale

के द्वारा: nishamittal nishamittal

दिनेश जी सादर, समीरखान जी का लेख पढ़ कर आये हैं आप, तभी अभी भी कुछ-कुछ असर दिखाई देता है, लेकिन ये सच है, कुछ-कुछ हमें भी लगता है, ऐसा ही हुआ था....... टिम्सी जी, हमारे यहाँ, एक पंजाबी शायर ने कहा है, : ''भगत सिंह, तेरी फोटो क्यों नहीं लगदी नोटां ते.......'' मतलब, भगत सिंह ने जो कुर्बानी दी, क्या वो किसी गाँधी या नेहरु के कार्यों से बढकर नहीं थी क्या, इसलिए गाँधी की जगह, भगत सिंह की फोटो क्यों नहीं लगती भारतीय करेंसी के ऊपर..... और कहाँ, इस कांग्रेस पार्टी ने भगत सिंह को 'देशद्रोही' और 'आतंकवादी' जैसे नामों से अलंकृत किया.... भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, सुभाश्चंद्रबोस, चंद्रशेखरआजाद, जैसे हीरे वापस नहीं आयेंगे, लेकिन जरूरत पड़ी तो यहाँ हम जैसो में से ही पैदा होंगे........ और लगता है, वो दिन दूर नहीं, जब इन बेलगाम नेताओं पर नकेल डालने के लिए, कोई न कोई भगत सिंह फिर से आएगा.......धन्यवाद, टिम्सी जी, दिनेश जी..............

के द्वारा: vikramjitsingh vikramjitsingh

के द्वारा: Timsy Mehta ( टिम्सी मेहता ) Timsy Mehta ( टिम्सी मेहता )

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नमस्ते टिम्सी जी, आप एक नितांत ही अछूता विषय ले कर आई हैं जो सीधा सीधा संस्कृति से सम्बंधित है। यह विषय इतना व्यापक है कि इसके बारे में प्रतिक्रिया के स्थान पर एक पोस्ट की आवश्यकता पड़ेगी। फिर भी संक्षेप में यही कहूँगा कि यहाँ पर जिस परम्परा का आपने ज़िक्र किया है वो केवल इसलिए है कि सब राजपाट खत्म हो जाने के बाद भी वो अपने आप को दूसरों से अलग समझना चाहते हैं। यह उनकी सोच है कि उनके अंदर राजसी गुण अभी विद्यमान हैं। यह एक सामंतवादी सोच जैसा है। एक तरह की खानदानी सनक कि मैं विशिष्ट हूँ जो मेरे पास है वो किसी और के पास नहीं। हालांकि यहाँ बनारस में भी इसका एक उदाहरण मिलता है पर उसका आधार विशुद्ध व्यवसायिक है। यहाँ के पान बहुत मशहूर हैं और इसका व्यापार करने वाले चौरसिया बंधु पान के पत्ते के संरक्षण की प्रक्रिया जिस स्थान पर करते हैं वहाँ अपनी बेटियों को नहीं जाने देते ताकि उनके संरक्षण की कला किसी दूसरे के घर में न पहुंचे और उनके व्यवसायिक हितों पर कोई दुष्प्रभाव पहुंचे। एक अच्छी सांस्कृतिक-सामाजिक पोस्ट के लिए हार्दिक बधाई। आभार सहित,

के द्वारा: वाहिद काशीवासी वाहिद काशीवासी

अपनी विशिष्टता बनाये रखने के लिए अगर सूर्य ने भी धरती को अपना प्रकाश देना बंद कर दिया होता, तो आज धरती पर जीवन का लवलेश भी न होता. फूलों ने अपनी विशिष्टता बनाये रखने के लिए अगर अपनी पंखुड़ियाँ न खोली होती, तो दुनिया में सुगंध का नाम भी कोई न जानता होता. कवि-गीतकार ने अगर अपनी कृतियाँ स्वयं तक ही रखी होती, क्या तब जीवन संगीतरहित होकर नीरस-उबाऊ न हो गया होता! विचारकों ने भी अगर अपने विचार खुद तक ही महफूज़ रखे होते, तो दुनिया में कभी कोई नवीन क्रान्ति न आ पाई होती. हम लोग आज तक भी शायद पैदल यात्रा कर रहे होते, आदरणीय शशि भूषण जी, सुप्रभात. अगर जे जे मंच न होता तो आपका आशीर्वाद , स्नेह भी न मिला होता.

के द्वारा: PRADEEP KUSHWAHA PRADEEP KUSHWAHA

मैंने आपकी इस टिप्पणी को लगभग ५-६ बार पढ़ा. और हर बार, हंसते हुए! आपके शब्दों में ही 'लाफिंग गैस' छिपी होती है. जहां तक उत्साहहीन उत्तर देने का आरोप है, तो अपनी सफाई में मुझे यही कहना है, की यह आरोप निराधार है मीलॉर्ड! सच तो यह है, की इस बार आप सब ने मुझे इतनी स्नेहसिक्त स्वीकृति दी है, जो मुझे धन्यवाद से भरे रखती है. कहने को उतने विशेष शब्द मिल ही नही पाए. और यकीन कीजिये, कांटेस्ट के लिए लिखी जरुर थी, पर अगर आप कांटेस्ट के प्रारूप को जांचेंगे, तो देखेंगे,की मैंने मानदंडों के विपरीत इसे लिखा था. तो.. परिपाटी से हटकर अपने ये विचार प्रस्तुत करना ही एकमेव लक्ष्य था. कांटेस्ट जीतने की तो स्थिति ही नहीं दीख रही थी. इसलिए, उत्साहहीन होने का प्रश्न ही नहीं उठता. और उससे भी बड़ी बात, की जो स्वीकृति अब मिली है, वह यों ही हर्षित कर रही है. फिर भी यह आरोप! नहीं-नहीं-नहीं! और चुनावी कांटेस्ट में भागीदारी, मेरे लिए तो असंभव के समान है. राजनीती नामक ऊँट की करवट की दिशा बता पाना मेरे बस की बात नाही है..! हाहा.. जो भी हो, इस बार के लाफ्टर-चेलेंज में विजेता बनकर निकलने की आपको मेरी और से ढेरों शुभकामनाएं! दल-बल के साथ जाइए, और जंग जीत आइये. अंत में, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद... सादर.

के द्वारा: Timsy Mehta ( टिम्सी मेहता ) Timsy Mehta ( टिम्सी मेहता )

महोदय, सादर क्षमाप्रार्थी हूँ. पर यह समझ पाने में अक्षम हूँ, की आपकी यह टिप्पणी सहमती दर्शा रही है, या असहमति.. यदि आप असहमत हैं, तो मुझे स्पष्टीकरण देने का प्रयास करना ही चाहिए. मैंने पूरे आलेख में यही पक्ष रखा है, की मनुष्य 'देने' की प्रथा को बिसार ही चुका है. और इसी क्रम में, प्रेम के वास्तविक मायने कहीं खो चुके हैं. वह प्रकृति ही है, जो हमें प्रेम का वास्तविक अर्थ समझा सकती है, यदि हम समझने के इच्छुक हों तो. एक माता की तरह वह हमसे निश्छल प्रेम करती है. वह देना जानती है. अत: वह प्रेम करना जानती है. मेरा आशय था, की मनुष्य बाहरी, और आंतरिक दोनों प्रकृतियों की अनदेखी करते हुए, विकृतियों की यात्रा पर निकला हुआ है. बस, वही कहने का प्रयास किया था. यदि अब भी आपको किसी कोण से असहमति प्रतीत होती है, तो अवश्य अवगत कराएँ! सादर धन्यवादी हूँ.

के द्वारा: Timsy Mehta ( टिम्सी मेहता ) Timsy Mehta ( टिम्सी मेहता )

आदरणीया टिम्सी जी, सादर नमस्कार,     भाषा पर आपकी मजबूत पकड़ की सराहना न करना मेरे विचार से आपकी प्रतिभा के  साथ अन्याय होगा। मैं इस अन्याय का भागीदार नहीं बनते हुये, आपकी भाषा शैली की अत्यधिक सराहना करता हूँ। शब्दों का चयन भी बेमिसाल  है।      विषय के साथ ही विश्लेषण भी उच्चस्तरीय है। सच है कि प्रेम को समय में बांधना बालहठ के अतिरिक्त कुछ नहीं है। प्रेम तो सर्वकाल एवं सर्वव्याप्त है। यदि प्रेम को ईश्वर कह दिया जाय तो शायद अतिशयोक्ति न होगी। जहाँ प्रेम है वहीं ईश्वर है तथा जहाँ ईश्वर है वहीं प्रेम है अथवा ईश्वर ही प्रेम है। यह भी निर्विवाद सत्य है कि प्रेम का विषय बहुत ही जटिल है।    हम भ्रम वश वासना को प्रेम समझ लेते हैं। प्रेम तो जीवन है, धड़कन है, इसके बिना शायद मैं तो एक पल जीवित नहीं रह सकता। प्रेम को अपनी महत्ता सिद्ध करने के लिये शायद हमारी अवश्कता नहीं है, अपितु हमें अपनी महत्ता स्थापित करने के लिये प्रेम की आवश्यकता है।    प्रेम मनुष्य का स्वाभाविक गुण है। स्वाभाविकता को दिखाने और मनाने की जरूरत क्यों पढ़ गई मेरी समझ के बाहर है।    टिम्सी जी माफ करना, शायद कुछ अधिक लिख गया, यदि कुछ अनुचित लगे तो छोटा भाई समझ कर माफ कर देना।

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

बहुत दिनों के बाद आज सफलता मिल पाई कमेन्ट पोस्ट हो गया पार्टी ड्यू हो गई -  हा हा हा हा हा हा मैंने पहले ही कहा था की जो हो रहा है होने दो लेकिन फिर भी आपने पंगा ले ही लिया अपनी बात खुद ही काटनी पड़ गई - और उसका आपको पता भी नहीं चला - इसको कहते है समय का फेर - इस लेख को कांटेस्ट के लिए जितने समर्पण + मेहनत और उत्साह से आपने लिखा था लेकिन जब यह पता चला की इस तरह का कोई कांटेस्ट ही नहीं है तो आपकी सक्षम और जादुई लेखनी से प्रभावित होकर जिन्होंने भी आपको अपने कमेन्ट से नवाजा उनको आपने उत्साहहीन उत्तर दिए ..... भला इसमें किसी का क्या कसूर है भला ..... किसी भी इनाम से बढ़कर ब्लागरो का प्यार और स्नेह है .... फिर भी चुनाव कांटेस्ट तो चल ही रहा है उसके लिए मेरी शुभकामनाये अग्रिम रूप से ..... मैं जिसको शुभकामनाये देता हूँ वोह जीतता ही है (इतिहास गवाह है )

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

आदरणीया महोदया जी, अभिवादन. इस लेख को मैं कई कई बार पढ़ रहा हूँ. चिडिया और प्रेम कुछ कुछ समझ आ रहा था . प्रेम की अभिव्यक्ति के लिए दिन, महिना, तारीख हो, होली दीवाली के लिए वार्षिक हो, भ्रमित कर रहा था. पर आपने मिन्टोस की गोली दी दिमाग ऑन हो गया. एक भयातुर पक्षी भी जब हमारे आगे समर्पण कर दे, तो जान लेना चाहिए, कि प्रेम-भाव सिद्ध हो गया है. विकृतियों का आवरण हटकर संस्कृति का उद्भव स्वयं हो जायेगा. फिर किसी ‘वेलेंटाइन-डे’ पर अपने अस्तित्व की भिक्षा मांगता प्रतीत नहीं होगा प्रेम! ‘प्रेम’ मेरी समझ में भावनाओं का वह विशुद्धतम स्वरूप है, जो केवल मन से ही एक अदृश्य रस के रूप में प्रवाहित होता है, और सिर्फ मन ही उसे ग्रहण कर सकता है. यहाँ उद्देश्य कुछ पाना तो होता ही नहीं है, बस.. देना, बाँटना, फैलाना! अपनी शुभकामनाओं को, शुभ-भावों को शब्दों की आकृति में सीमित किये बिना, और किसी प्रत्युत्तर की आशा से रहित होकर अर्पण करते रहना ही तो प्रेम है!

के द्वारा: PRADEEP KUSHWAHA PRADEEP KUSHWAHA

महोदय, आपके शब्द बहुत अच्छे लगे. निजी मत दूं, तो वेलेंटाइन डे मनाने में आपत्ति होनी चाहिए, अथवा नहीं, यह बहस का विषय है. पर उसे प्रेम का नाम देना अटपटा लगता है. इस आलेख में, मैंने ऐसा कहने का प्रयास किया है, की जिसे यहाँ प्रेम का नाम दिया जा रहा है, वह एक बहुत ही सतही भाव-वृत्ति है. और प्रेम का अपमान भासता है इसमें. लेकिन जहां समर्पण है, विश्वास है, मूल्यों का निर्वाह है, वहां कोई प्रश्न नहीं उठना चाहिए. यदि आप इस अवसर पर नैष्ठिक होकर किसी को उपहार देते हैं, तो ठीक है. पर प्रश्न तो निष्ठा का ही है न! वह हो तो...! और यदि निष्ठा है, तो दिन कोई भी हो, उत्सव स्वयम हो ही जाएगा.. पुन:, मैंने जिन बिन्दुओं पर आलेख में विचार दिए हैं, वे उपस्थित हैं.. १. वेलेंटाइन डे जैसे अवसरों पर जो प्रदर्शन होता है, उसमे भावों की गहराई का भला क्या स्थान है! सतही, दिखावटी, नकली, दिन-दिन में बदल जाने वाले भाव को प्रेम कहने की परंपरा ही कहाँ से शुरू हो गयी होगी! २. वेलेंटाइन डे जैसे भ्रामक शब्द उन भावों का चुपके-ही दोहन करने लगते हैं, जिन्हें सूक्ष्मता में मग्न होना भा रहा होता है. ३. मन दोबारा चल निकलता है किसी नए जलाशय की खोज में. ऐसी खोज किसी वेलेंटाइन डे-सदृश नाम से कभी उत्तरित नहीं हो सकती. प्रेम, अथवा पूर्णता ‘देने’ पर ही घटित होता है. ४. एक भयातुर पक्षी भी जब हमारे आगे समर्पण कर दे, तो जान लेना चाहिए, कि प्रेम-भाव सिद्ध हो गया है. विकृतियों का आवरण हटकर संस्कृति का उद्भव स्वयं हो जायेगा. फिर किसी ‘वेलेंटाइन-डे’ पर अपने अस्तित्व की भिक्षा मांगता प्रतीत नहीं होगा प्रेम! ५. ‘प्रेम’ मेरी समझ में भावनाओं का वह विशुद्धतम स्वरूप है, जो केवल मन से ही एक अदृश्य रस के रूप में प्रवाहित होता है, और सिर्फ मन ही उसे ग्रहण कर सकता है. यहाँ उद्देश्य कुछ पाना तो होता ही नहीं है, बस.. देना, बाँटना, फैलाना! अपनी शुभकामनाओं को, शुभ-भावों को शब्दों की आकृति में सीमित किये बिना, और किसी प्रत्युत्तर की आशा से रहित होकर अर्पण करते रहना ही तो प्रेम है! ..... इसे पढकर आप शायद मानेंगे, की मेरी आपत्ति विशेष रूप से दिवस-विशेष पर न होकर प्रेम के नाम पर उपजती विकृत्तियों हेतु है. आशा है, आप इसपर दृष्टिपात करेंगे, एवं कोई भूल हो, तो क्षमा करेंगे. सादर धन्यवाद.

के द्वारा: Timsy Mehta ( टिम्सी मेहता ) Timsy Mehta ( टिम्सी मेहता )

टिम्सी जी नमस्कार, बहुत सुन्दर आलेख. सत्य है प्रेम तो स्वतः उपजने वाली चीज है कोई दिखावे की वस्तु नहीं.किन्तु वेलेंटाइन डे यदि मनाया जाता है तो आपत्ति क्या है? क्या भारतीय इस बात से घबराहट में हैं की यह विदेशी त्यौहार है और हमारी संस्कृति पर आक्रमण है? हमारे देश के कोई बाबाजी के मन की उपज होती तो यह बहुत अच्छा त्यौहार होता? मैंने कहीं पढ़ा था की आप अपने परिवार में पत्नी बच्चों से प्यार करते हैं तो उन पर प्रदर्शित भी करें ताकि वे अधिक अच्छा महसूस करें और वेलेंटाइन डे भी मुझे उसके लिए एक अवसर के सामान दिखता है. यूँ तो हम कई बार परिवार के साथ होटल में खाना खाने जाते हैं, अब यदि मै अपनी पत्नी को वेलेंटाइन डे पर होटल में ले जाऊं तो मुझे नहीं लगता की उसे बुरा लगेगा और यूँ तो कम ही मौके आते हैं जब में पत्नी को पुष्प गुच्छ भेंट करूँ यदि मै वेलेंटाइन डे पर उसे पुष्प दूँ तो क्या उसे बुरा लगेगा? हाँ यदि कोई सड़क पर प्रेम का इश्तहार लेकर घूमता है तो यक़ीनन वह हमारी संस्कृति नहीं है. किन्तु प्रेम किया है तो उसे किसी ख़ास दिन व्यक्त करने में संकोच भी नहीं है.

के द्वारा: akraktale akraktale

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हम हर दिन उल्लास में जियें. प्रकृति प्रदत्त आशीष को समझें. मन में व्यर्थ वैर-विरोधाभास को स्थान न दें! अकारण ही शुभत्व का विस्तार करते रहें. उसके बाद किसी से प्रेम की परिभाषा पूछने की आवश्यकता नहीं रह जाएगी! प्रेम हमारा स्वभाव हो जायेगा. एक भयातुर पक्षी भी जब हमारे आगे समर्पण कर दे, तो जान लेना चाहिए, कि प्रेम-भाव सिद्ध हो गया है. विकृतियों का आवरण हटकर संस्कृति का उद्भव स्वयं हो जायेगा. फिर किसी ‘वेलेंटाइन-डे’ पर अपने अस्तित्व की भिक्षा मांगता प्रतीत नहीं होगा प्रेम! आदरणीया मेहता जी , सादर अभिवादन. मेरा भी मन करता है. बगिया में चिड़ियों के साथ खेलने का, ऐसा नहीं हो सका है. लेख आपका ऐसा है जैसे पेपर सोल्व कर रहें हो. सुन्दर badhai.

के द्वारा: PRADEEP KUSHWAHA PRADEEP KUSHWAHA

टिम्सी जी नमस्कार, सबसे पहले आपकी भाषा शैली और उस पर आपकी मज़बूत पकड़ की दाद देना चाहूँगा। आपके लेख में व्यक्त विचारों से पूरी सहमति रखता हूँ मैं। निस्वार्थ, निष्कलंक, निश्छल होता है प्यार| और जिसे हो जाता है वो भी ऐसा ही हो जाता है। प्रेम एक उदात्त भावना है जिसका काम सिर्फ़ और सिर्फ़ देना है पाने की कोई आकांक्षा नहीं होती। चाहे धरती हो या आसमान, नदी हो या झरने,पेड़-पौधे, यहाँ तक की ख़ुद अपने अंदर झाँकने पर भी प्यार ही नज़र आएगा पर शर्त यही है कि हमें स्वयं से और औरों से प्यार करना आना चाहिए।वैलेंटाइन डे को आज भले ही प्रेम-दिवस का दर्ज़ा दे दिया गया है मगर हम सबको पता है कि वो तो हमेशा से और हर जगह व्याप्त है, ज़रूरत है उसे पहचानने की अपने अंदर के प्यार को जगाने की। साभार,

के द्वारा: वाहिद काशीवासी वाहिद काशीवासी

दूसरी ओर, वेलेंटाइन डे जैसे अवसरों पर जो प्रदर्शन होता है, उसमे भावों की गहराई का भला क्या स्थान है! सतही, दिखावटी, नकली, दिन-दिन में बदल जाने वाले भाव को प्रेम कहने की परंपरा ही कहाँ से शुरू हो गयी होगी.. प्रेम मनुष्य का स्वभाव है. और स्वभाव में जीना ही प्रसन्नता का कारक होता है. पर विपरीत दिशा में चलते हुए स्वाभाविक जीवन सम्भव नहीं है... टिम्सी जी सुन्दर सम सामयिक लेख ..सुन्दर विचार हैं आप के आइये प्रेम के अनेक छिछोरे रूपों में न जा के प्रेमी दिवस के रूप में अपने नैसर्गिक वास्तविक प्राकृतिक रूप में प्यार से दिल से इसे मनाएं .. ये रोज वाला ही प्रेम हो रोज हो तो आनद और आये .. जय श्री राधे भ्रमर ५

के द्वारा: surendra shukla bhramar5 surendra shukla bhramar5

timsy जी बहुत ही सुन्दरता पूर्वक प्रेम की व्याख्या की है आपने. बहुत ही सुन्दर. मैं भी इस विषय में बस इतना कहना चाहूँगा. क्या होता है valentine day ? क्या प्रेम करने के लिए किसी ख़ास अवसर या दिन की आवशयकता है. हम उस देश के वासी है जहां पूर्ण वर्ष प्रेम के गीत गाये जाते रहे है. गोपिय १२ माह कृष्ण से प्रेम में डूबी रहती थी, मीरा नाचती थी नित्य हर शन्न भूलकर, बुल्लेशाह के प्रेम का क्या कहना. माँ का संतान से प्रेम किसी निश्चित दिन का मोहताज नहीं फिर क्यों पड़ी हमें आवशयक औरो के बनाए दिन मनाने की. क्या हम सभी दिन प्रेम करना भूल तो नहीं गए? मदर डे, फादर डे की क्या है आवशकता. उन्हें एक फूल देकर जो उनका न किया मान न रखा सम्मान तो उसका क्या फायदा. मात पिता तो हर दिन है पूज्य. यदि एक बार भी प्रेम को हम जान पाते तब हम यह प्रशन अवश्य उठाते, क्या होता है valentine day ?

के द्वारा: Amar Singh Amar Singh

टिम्सी जी, नमस्कार प्रेम क्या है, हम तो अभी तक नहीं समझ सके और इच्छा भी नहीं है समझने की क्यूंकि इसकी कोई परिभाषा नहीं बनाई गयी है मूलतः ये हमारे अन्दर की आवाज़ है जो हमें बतलाती है की कोई जिसके बारे में हम अच्छा सोचते है या जो हमारे बारे में अच्छा सोचता है वे एक दुसरे के प्रेमी है, फिर चाहे वो कोई भी हो आदमी, जानवर या कोई निर्जीव वस्तु भी पर आज प्रेम का प्रमाण पत्र के रूप में इस "‘वेलेंटाइन-डे’ को इतना उठा दिया गया है की हंसी आती है ऐसे बांतो पर अभी कुछ दिनों पहले मैंने न्यूज़ में पढ़ा था की अमेरिका में लोग पतलून दिवस मना रहें थे जिसमें वहाँ के लोग एक दिन बिना पैंट के ही बाहर निकल काम पे जा रहें थे, बस इसी तरह ही कुछ ‘वेलेंटाइन-डे’ के साथ भी हुआ होगा और हो सकता है की भविष्य में हम भी पतलून दिवस मनाये हमारी समस्या ही यही है हम कोम्पितिसन में लगे हुए है बुरी बात नहीं है पर समस्या यह है की आज की नयी पीढ़ी को भुत सवार हो गया है उनकी नक़ल करने का, और इसका परिणाम ये हो रहा है की घर के लोग भी उन्हें आजादी दिए हुए है जिसका बेमतलब फायदा उठाया जा रहा है खैर आच्छी लेख पर आपको बधाई, और सुभकामनाए की आपके किसी परिचित को ये रोग ना लगे..........हा हा हा

के द्वारा: ANAND PRAVIN ANAND PRAVIN

के द्वारा: Timsy Mehta ( टिम्सी मेहता ) Timsy Mehta ( टिम्सी मेहता )

वी.आई.पी के लिए भी 'चलता' है.. आम आदमी के लिए भी 'चलता' है.. पर जिनके पेट-पीठ एक हो चुके हैं... उनके लिए नहीं 'चलता'. उनका स्वप्न हमारी तरह 'वी.आई.पी' होना न होकर...घर में आटे का कनस्तर भरा देखना होता है. पर हमारी सपनों से भरी आँखें उनकी आँखों के दर्द कभी पढ़ नहीं पाती. हम को तो बस अपने प्रिय अभिनेता, और खिलाडियों के सलामती की दुआ करना अच्छा लगता है, क्योंकि वो महँगी घड़ियों की एड करते हैं. महंगे चश्मे-जूतों का प्रदर्शन करते हैं. अक्सर विदेश जाया करते हैं. और महँगी शराब पीते हैं. 'कभी-कभी' कोई गैर-कानूनी काम भी कर लेते हैं.....या शायद पकड़े 'कभी-कभी' जाते हैं. खैर, जो भी हो, आदर्श चुनने के मामले में हमारा कोई मुकाबला नहीं है. जय भारतवासी. अन्यथा न लें, मन का रोष निकल जाता है कभी-कभी.. सादर धन्यवाद.

के द्वारा: Timsy Mehta ( टिम्सी मेहता ) Timsy Mehta ( टिम्सी मेहता )

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अच्छे बच्चे ज्यादा चाकलेट नहीं खाया करते और अगर खा भी लिया है तो एक बार उठने से पहले और दूसरी बार सोने के बाद ब्रुश जरूर करते है ..... क्यों ना लगे हाथ एक लेख नकली (क्रर्तिम ) चाकलेट बनाम(प्राक्रतिक ) असली गन्ना हो जाए ...... वैसे डाबर का मिस्वाक + डाबर लाल दंत मंजन और काला नमक तथा सरसों का तेल(दो चम्मच तेल में चुटकी भर नमक मिला कर मुंह में हिलाते हुए थोड़ा -२ मिश्रण बाहर गिराते हुए ज्यादा से ज्यादा देर तक करने पर गन्ना चूस सकते है ) हा हा हा हा हा हा हा हा हा :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| का इस्तेमाल गन्ने को खाना सहज बनाता है

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

'हे राम'...!!! आपकी अद्भुत टिप्पणी पढ़कर सीधे यही निकला मेरे मन से! हाहा.. बिलकुल ठीक पहचाना आपना, 'wisdom tooth' ही निकल रहा है..! देखते हैं, wisdom में कुछ इजाफा हो पाता है या नहीं इसके बाद..! दर्द में भी हँसा दिया आपने! किस मुँह से धन्यवाद दूं! :) अब तारीफ की बारी आपकी आती है. १) आप किसी को दर्द में भी हँसा सकती हैं. साधुवाद. २) आपकी नज़र बहुत पैनी है. राष्ट्र्धन बन सकती है ये!(आपकी लेखनी के माध्यम से).. ३) आपके विचारों में ईमानदार प्रस्तुती झलकती है. ४) आपके विचारों एवं प्रस्तुती में स्पष्टता बहुत नज़र आ रही है. एक कुशल अधिवक्ता के गुण होते हैं ये. ... और भी बहुत सारी तारीफ हो सकती है. पर अगली वार्ता के लिए भी तो कुछ बचाकर रखना ही चाहिए..और ये केवल एक प्रत्युत्तर नहीं, अपितु स्वत: उत्पन्न प्रतिक्रिया है.! :) स्वागतम, एवं धन्यवादम!

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कमाल की रचना, हमारे हाथों की तरह एक एक शब्द एक दूसरे से जुड़े हुये प्रतीत होते हैं। सॉरी, प्रतीत नहीं होते बल्कि सचमुच जुड़े हुये हैं। बहुत ही उच्च श्रेणी की रचना। बूँद को सागर बनाने वाली रचना। लय, गति, तारतम्य तीनों में अद्भुत सामन्जस्य। सुन्दर शब्द चित्र अंकित किये हैं आपने। छोटी सी रचना किन्तु संदेश इतना बड़ा कि शब्दों में न समा सके। बिहारी के दोहों की तरह। यह अतिशयोक्ति पूर्ण प्रसंशा नहीं है। अपितु  इसकी हकदार है। प्रत्येक व्यक्ति से जुड़ी है यह रचना। रचना की  महानता इसी से स्थापित होती है कि इसके पहले शब्द से लेकर आखरी शब्द तक मैं जुड़ा रहा। यह रचना इससे भी  अधिक सराहना की अधिकारी है, इसलिये क्षमा चाहता हूँ, क्योंकि सही शब्दों का चयन नहीं कर पा रहा हूँ। बस अंत में अनगिनत आभार....... कृपया इसे भी पढ़े- आयुर्वेदिक दिनेश के दोहे भाग-2 http://dineshaastik.jagranjunction.com/

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

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आदरणीय भ्राता जी..! पुन: स्वागत है मंच पर आपका..! शायद ही कोई नित्य लेखक-पाठक हो, जिसे आपकी अनुपस्थिति खली न हो इस बीच..! फिर भी, सबका जीवन है, व्यस्तताएं हैं..! समझ में आता है. :) आपकी इस उदार टिप्पणी का प्रत्युत्तर देने के लिए बहुत प्रयास किये. पर शब्द कम ही रहेंगे..! इसलिए.. केवल 'धन्यवाद'..! और रचना समंदर जी का आपने नाम लिया. आपको आश्चर्य होगा, पर केवल दस दिन पहले ही उनके बारे में मुझे पहली बार पता चला. उनके लेख खोजने की कोशिश भी की, पर मिल नहीं पाए. खैर, दिग्गजों के साथ मेरा मिलान, बस आप लोगों का बड़प्पन है..! पुन:-पुन: आभार..! पुन: नव-संवत्सर, एवं उससे पहले के सभी त्योहारों के लिए बहुत-बहुत बधाई स्वीकारें..! सादर..!

के द्वारा: Timsy Mehta ( टिम्सी मेहता ) Timsy Mehta ( टिम्सी मेहता )

के द्वारा: RaJ RaJ

के द्वारा: mparveen mparveen